गैरसैण | ये आफताब और अंधेरों की साजिश तो नहीं !

729

ashish-tiwariगैरसैंण से लौटकर आशीष तिवारी | सालों से बहुतेरी उम्मीदों को करीने से सहेज कर रखा था, गैरसैंण सत्र की बात चली तो उम्मीदों का पूरा टोकरा लेकर भैराणीसैंण के ऊंचे पहाड़ों पर चढ़े थे लेकिन उन उम्मीदों को बेतरतीब समेट कर वापस ढलान पर उतर आए।

दिवाली खाल, जंगल चट्टी, आदिबदरी, खेती और ताल जैसे इलाकों से गुजरती सड़कों से सफेद गाड़ियां बोझल आंखों में उनके ख्वाब छोड़ देहरादून वापस लौट गईं।

देश का शायद ये एकलौता ऐसा राज्य है जो अपने निर्माण के सोलह सालों में इत्मिनान से ये तय ही नहीं कर पा रहा कि उसकी राजधानी कहां होगी। राज्य के आवाम की भावनाएं कहती हैं कि गैरसैंण को राजधानी बना दिया जाए लेकिन सियासत का मूड कुछ और ही है। राजनीतिक इच्छाशक्ति ने हर बार सूबे के शासकों का साथ छोड़ दिया और सियासी नफा नुकसान हावी हो गया।

17 और 18 नवंबर को भराणीसैंण के निर्माणाधीन विधान भवन में हुए विधानसभा सत्र के दौरान राज्य की जनता न जाने क्यों लेकिन इस बात की उम्मीद लगाए बैठी थी कि शायद मौजूदा सरकार और मौजूदा मुख्यमंत्री राजधानी के मसले पर निर्णायक फैसला सुना देंगे। लेकिन विशाल विधान भवन के सभा मंडप की ठंडी दीवारों के बीच बैठकर शायद सरकार और ‘सरकार’ दोनों के हौसले ठंडे पड़ गए। गैरसैंण को राजधानी बनाने की घोषणा तो नहीं हुई लेकिन सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। हां, दिलासा देने के लिए बजट सत्र में भराणीसैंण आने जाने का सिलसिला शुरु हो जाएगा।

भराणीसैंण में बने विधानभवन की दीवारों के सामने पसरी ठंड की सुनहरी धूप दिन भर अलसाई सी रहती है। कभी कभी लगता है कि मानों सूरज को बगल के पहाड़ के पीछे छुप जाने की जल्दी है। इस आफताब को थाम लेने के लिए कोई रहता भी तो नहीं। सूरज जल्दी से छुप जाता है और घुप्प घनघोर अंधेरा सूबे की उम्मीदों की दीवारों पर पसर जाता है।