आपका ब्लॉग | भोपल गैस त्रासदी- स्कूल किताब से हकीकत तक

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आपका ब्लॉग के लिए दीपक तिवारी [उत्तराखंड पोस्ट ब्यूरो]  दुनिया के नक्शे पर झीलों की नगरी भोपाल किसी पहचान की मोहताज नहीं है, लेकिन अफसोस ये पहचान ऐसी है, जिसके बारे में सोचकर आज भी रूह कांप उठती है।

दुनिया की सबसे भीषण रसायनिक त्रासदी का गवाह बना झीलों का शहर 2-3 दिसंबर 1983 की सर्द रात को पलभर में ही श्मशान में तब्दील हो गया। यूनियन कार्बाईड कारखाने से निकली जहरीली गैस मिथाइल आईसो-सायनाईट ने पलभर में ही हजारों जिंदगियां लील ली। हजारों लोगों को गहरी नींद में ही मौत ने अपने आगोश में ले लिया तो कुछ जान बचाकर बदहवाश से भागे जा रहे थे। किसी को नहीं पता था कि किस दिशा में भागकर अपनी जान बचानी है, लेकिन हर कोई इस घुटन, बेचैनी से दूर भाग जाना चाहता था, जिनकी किस्मत अच्छी थी वो तो बच गए लेकिन अफसोस हर कोई इतना खुशकिस्मत नहीं था।

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किस्मत तो इस गैस के प्रभाव में आकर जीवित बचने वालों की भी इतनी अच्छी नहीं थी, क्योंकि उनकी सांसें भले ही न थमी हो लेकिन वे कई तरह की गंभीर बीमारियों का शिकार हो गए। उनके लिए जिंदा रहना किसी श्राप की तरह हो गया था। कुछ ने कुछ सालों के अंतराल में दम तोड़ दिया तो कुछ आज भी इसका दंश झेल रहे हैं। सब कुछ यहीं थम जाता तो ठीक था लेकिन भोपाल की तीसरी पीढ़ी पर भी इसका असर देखा जा रहा है, जो ये बयां करने के लिए काफी है कि 2-3 दिसंबर की रात इस जहरीली गैस ने मौत का कैसा तांडव मचाया होगा।
भोपाल से मेरा तो सीधा तौर पर कोई ताल्लुक नहीं था, बचपन में स्कूली किताबों में भोपाल गैस त्रासदी की याद में बने स्मारक की तस्वीर जेहन में बसी हुई थी।
2008 में जब भोपाल में काम करने का मौका मिला तो स्कूली किताब में छपी वो स्मारक की तस्वीर आंखों के सामने थी। गैस पीड़ित बस्तियां और उसमें बसे लोगों के हालात बताने के लिए काफी थे कि 24 सालों में भोपाल गैस त्रासदी पीड़ितों को उनका हक नहीं मिल पाया था। सरकारी इमदाद में हालांकि कोई कमी नहीं थी, लेकिन वास्तविक हकदार खाली हाथ थे। कुछ ऐसी ही स्थिति गैस पीड़ितों के लिए बनाए गए अस्पतालों की भी थी। अस्पताल की इमारतें तो बुलंद थी लेकिन सुविधाओं और दवाओं के नाम पर कुछ नहीं था।  
पीड़ा तब और भी बढ़ जाती है, जब इस त्रासदी का सबसे बड़ा गुनहगार, हजारों मौत का जिम्मेदार वारेन एंडरसन को सरकार उसके जीते जी सजा दिलाना तो दूर उसे गिरफ्तार तक नहीं कर पाई। ख़बरें तो ये भी थी कि तत्कालीन राज्य और केन्द्र सरकार ने ही उसे भोपाल से निकालकर सुरक्षित विदेश पहुंचाने में पूरी मदद की !
भोपाल की इस भीषण रसायनिक त्रासदी अब 34 वर्ष पूरे कर चुकी है, तो एक बार फिर से गैस पीड़ितों के जख्म हरे हो गए हैं। इस बार ये जख्म इसलिए भी ज्यादा तकलीफ दे रहे हैं क्योंकि इस त्रासदी का गुनहगार बिना सजा पाए ही आराम से अपनी हिस्से की जंदगी जी कर इस दुनिया को छोड़ चुका है, इसके साथ ही अधूरी रह गई है, गैस पीड़ितों के इंसाफ की लड़ाई !