नि:संतान दंपत्ति की झोली भरती हैं माता अनसूया, दर्शन मात्र से पूरी होती है मनोकामना

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चमोली [सुचिता तिवारी] शहर के कोलाहल से दूर, प्रकृति की गोद में, हिमालय के शिखर पर स्थित अनुसूया मंदिर तक पहुंचना किसी रोमांच से कम नहीं है। उत्तराखंड के चमोली में स्थित अनसूया माता मंदिर हिमालय की ऊंची पहड़ियों पर स्थित है इसलिए यहां पहुंचने के लिये आपको पैदल चढ़ाई करनी पड़ेगी और यही आपकी भक्ति की असली परीक्षा भी है।

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संतान प्राप्ति के लिए पहुंचते हैं लोग

यहां हर साल दत्तात्रेय जयंती समारोह मनाया जाता है। इस जयंती में पूरे राज्य से हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस मौके पर यहां नौदी मेले का आयोजन भी किया जाता है जिसमें भारी संख्या में लोग अपने-अपने गांव से देव डोलियों को लेकर पहुंचते हैं। ये देव डोलियां माता अनसूया और अत्रि मुनि के आश्रम का भ्रमण करती हैं। माता अनसूया के इस प्राचीन मंदिर में संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ भी कराया जाता है और मान्यता है कि इस यज्ञ में जप व पूजा-पाठ करने वाले को संतान की प्राप्ति अवश्य होती है।

नवरात्रि पर मिलता है विशेष प्रसाद

नवरात्रि के दिनों में अनुसूया देवी मंदिर में नौ दिन पूजन-अर्चन किया जाता है जिसमें भारी संख्या में पास के ग्रामीण शामिल होते हैं। मंदिर की विशेषता यह है कि उत्तराखंड के दूसरे मंदिरों की तरह यहां बलि का प्रावधान नहीं है। माता के दर्शन को पहुंचे श्रद्धालुओं को विशेष प्रसाद दिया जाता है जो स्थानीय स्तर पर उगाए गए गेहूं के आटे से बनाया जाता है।

माता अनसूया की कथा

कहते हैं कि इसी स्थान पर माता अनसूया ने अपने तप के बल पर त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और शंकर) को शिशु रूप में परिवर्तित कर पालने में खेलने पर मजबूर कर दिया था। बाद में काफी तपस्या के बाद त्रिदेवों को पुन: उनका रूप प्रदान किया और फिर यही तीन मुखवाले दत्तात्रेय का जन्म हुआ था। यही वजह है कि यहां संतान की कामना के साथ लोग आते हैं और उनकी इच्छा पूरी भी होती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

प्राचीन काल में यहां देवी अनुसूया का छोटा सा मंदिर था। सत्रहवीं सदी में कत्यूरी राजाओं ने इस स्थान पर अनुसूया देवी के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। कहते हैं कि अठारहवीं सदी में आए विनाशकारी भूकंप से यह मंदिर ध्वस्त हो गया था। इसके बाद संत ऐत्वारगिरी महाराज ने ग्रामीणों की मदद से इस मंदिर का पुन: निर्माण करवाया।

मंदिर में दिखेगा माता का दिव्य स्वरूप

मंदिर में प्रवेश से पहले भगवान गणेश जी की प्रतिमा एक शिला पर विराजमान है। कहते हैं कि भगवान गणेश की यह शिला प्राकृतिक रूप से निर्मित है। मंदिर के गर्भ गृह में सती अनसूइया की भव्य मूर्ति स्थापित है। मूर्ति पर चांदी का छत्र है।

मंदिर के प्रांगण में भगवान शिव, माता पार्वती एवं गणेश जी की प्रतिमा स्थापित है। इसके साथ ही सती अनसूइया के पुत्र दत्तात्रेय जी की त्रिमुखी प्रतिमा भी विराजमान है। माता अनसूया  मंदिर का निर्माण नागर शैली में किया गया है।

कैसे पहुंचे

ऋषिकेश से चमोली तक 250 किलोमीटर की दूरी आपको सड़क मार्ग से तय करनी होगी। यहां से दस किलोमीटर गोपेश्वर पहुंचने के बाद 13 किलोमीटर दूर मंडल तक वाहन की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन मंडल से आगे आपको अपनी टैक्सी, कार या अन्य साधन छोड़कर आगे की पांच किलोमीटर की यात्रा पैदल चढ़ाई चढ़कर पूरी करनी होगी।

यकीन मानिए माता अनसूया मंदिर में मां के भव्य दर्शन कर आप स्वयं को धन्य मानेंगे और वापस इस मंदिर की पवित्रता के साथ ही लौटेंगे।

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