हरीश रावत ने बताया- गैरसैंण को क्यों नहीं बना पाया उत्तराखंड की राजधानी !

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देहरादून (उत्तराखंड पोस्ट ब्यूरो) अपने कार्यकाल में गैरसैंण को प्रदेश की स्थायी राजधानी हरीश रावत भले ही घोषित करने की हिम्मत न जुटा पाएं हों लेकिन हरीश रावत का गैरसैंण प्रेम अब खूब छलक रहा है।

गैरसैंण पर हरीश रावत ने अपने फेसबुक पेज पर एक लंबी-चौड़ी पोस्ट लिखी है। हरीश रावत की फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि – गैरसैंण दहाड़-2 कर कह रहा है, मुझे अपणुसैंण मानो और एक स्पष्ट दिशा में काम करो। मैं प्रीतम सिंह जी व इन्दिरा ह्दयेश जी को बधाई दूंगा। उन्होंने गैरसैंण को राजधानी घोषित करने की मांग सदन में की है। कांग्रेस की इस घोषणा ने वर्तमान विधानसभा सत्र को अत्यधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। भाजपा पहले ही अजय भट्ट व मदन कौशिक के नेतृत्व में गैरसैंण को स्थाई राजधानी घोषित करने का संकल्प गैरसैंण में आहूत विधानसभा सत्र में प्रस्तुत कर चुकी है। सरकार के स्तर पर हिचकिचाहट के लिये कोई कारण नहीं है। वर्तमान सरकार के पक्ष में प्रचंड बहुमत है। राज्य के सभी क्षेत्रों का सत्ता पक्ष में समान प्रतिनिधित्व है। सत्तापक्ष के 58, विपक्ष के 11 और प्रीतम सिंह पंवार अर्थात समस्त सदन गैरसैंण के पक्ष में है। क्या किसी भी निर्णय को लेने के लिये ऐसी आदर्श स्थिति, उत्तराखण्ड की विधानसभा में आ सकती है?

ऐसी सर्व ग्राहयता का वातावरण 9 नवम्बर, 2000 में था। उत्साह व जोश से भरा हुआ उत्तराखण्ड राज्य के पक्ष में लिये गये किसी भी निर्णय के साथ था। हर मन में एक ही भावना थी, आधी रोटी खायेंगे, टैन्ट-चटाई में बैठकर सरकार चलायेंगे। उस वक्त हर किसी के मन-मस्तिष्क में एक शब्द गूज रहा था, ‘‘म्योरो उत्तराखण्ड’’। सुख-सुविधायें, पद, कार, स्टेटस, बंगला, लालबत्ती व वेतन किसी की सोच का हिस्सा नहीं था। उस वक्त चूक हो गई, निर्णय लेते वक्त जनभावना के बजाय स्थान सुविधा को ध्यान में रखा गया।

पिछले सत्रह वर्षों ने हमें बहुत बदल डाला है। हम नेतागण व नौकरशाह एक संघर्षशील, यत्नशील उत्तराखण्डी के बजाय, सुविधा भोगी, स्टेटस भोगी उत्तराखण्डी हो गये हैं। कोई अन्तर दिखता है, उत्तराखण्ड के सचिवालय की कार्य संस्कृति और उत्तर प्रदेश सचिवालय की कार्य संस्कृति में? सत्ता का लक्ष्य शहरी जीवन हो गया है। हममें से जिसने भी कुछ कमाया, उसने सबसे पहले अपने गाॅव को छोड़ा है। नेता देहरादून वाले हो गये हैं। पिछले वर्षों में गांव व अंतिम छोर का गरीब हमारा व हमारी नीतियों का लक्ष्य बिन्दु नहीं रहा। धार-गाड़-गधेरे, नाले-खाले हमारे संगी नहीं रहे, हम हॉट मिक्स चकाचक सड़क वाले हो गये हैं। हमारी प्राथमिकता गरीब का घर बनाने के बजाय शानदार गर्वनर हाउस व विशाल मुख्यमंत्री निवास का निर्माण बन गया। नैनीताल में ब्रिटिश गर्वनर जनरल के भवन सुविधायें भी हमारे लिये कम पड़ने लगी हैं।

गरीब साधनहीन उत्तराखण्डी ने लम्बी प्रतीक्षा की है। हम कभी तो उसकी ओर देखेंगे। मैंने प्राकृतिक व राजनैतिक त्रासदी के मध्य भी हरिद्वार के धाड़ खादर, जसपुर के राजपुर से लेकर धारचूला के क्विटी व उत्तरकाशी के सवाण, टिहरी के गंगी जैसे गाॅवों व गांववालों को सरकार की नीतियों व निर्णयों का केन्द्र बिन्दु बनाया। शायद लोगों को मेरे प्रयास व सोच एकांकी लगे। उसमें सरकार का सर्मपण नहीं दिखाई दिया। मैंने गांव-गरीब वादी सोच को राज्य का लक्ष्य तो बनाया, मगर सामूहिक अभियान नहीं बना पाया। लोगों तक योजनायें व लाभ तो पहुंचा मगर ‘‘मेरी सरकार’’ शब्द के अपनत्व का आभास उन्हें नहीं हुआ। जिनके लिये आज दो-अभी दो का नारा लगा उनको विश्वास नहीं दिला पाया कि, मैं गांव वाला हॅू, गरीब वाला हॅूं।

यह अविश्वास की खाई हम ही ने पैदा की है। सत्ता सभालने के पहले दिन से ही हमें अपने निर्णयों से राज्यवासियों को यह विश्वास दिलाना चाहिये था, हम बैठे भले ही देहरादून में हैं, मगर हमारी नीतियों व कार्यक्रमों का लक्ष्य आप हैं, आम उत्तराखण्डी हैं। मैं बहुधा अपनी पीठ ठोकते हुये कहता हॅू कि, मैंने 2014 में तिरहत्तर हजार रूपये की औसत प्रति व्यक्ति वार्षिक आमदनी वाले उत्तराखण्ड को अपनी नीतियों के बलबूते पर एक लाख इक्खत्तर हजार रूपया वार्षिक आमदनी वाले राज्य तक पहुचाया। आम उत्तराखण्डी के मन में सवाल उठता है कि, इस बढ़ोत्तरी में उसके हिस्से में कुल कितनी औसत बढ़ोत्तरी आई है, मात्र तीस हजार रूपया वार्षिक। वह तो आज भी करीब-2 उसी हालात में है, जहां वह राज्य बनने से पहले था।

पलायन व असंतुलित विकास का दंश झेल रहा यह उपेक्षित उत्तराखण्ड लगातार सरकारें बदल कर अपना गुस्सा निकाल रहा है। गैरसैंण में उसे अपनी तकलीफों का निदान दिखाई दे रहा है। उसे लगता है गैरसैंण में बैठकर ‘‘मेरी सरकार’’ मेरे लिये समझ व नीति बना कर उसे लागू कर सकेगी। आम उत्तराखण्डी गरीब है, मगर उसकी समक्ष गरीब नहीं है। उसे लगता है, पहाड़ों की गोद में बसे शिमला, एटानगर, एजल, गेंगटोक, इम्फाल, सिलोंग आदि में बैठकर यदि वहां के नेता शासन व्यवस्था चला सकते हैं तो, मेरे नेताओं को मुझसे परहेज क्यों है। जब चामलिंग संगमा व वीरभद्र सिंह को पूस व माघ की ठंड से परेशानी नहीं है तो, मेरा चुना हुआ हरीश रावत गैरसैंण का नाम सुनते ही क्यों ठंड से कुड़-कुड़ाने लगता है।

 

प्रश्न खड़ा करने से पहले, मैं कुछ शब्द अपनी सफाई में भी कहना चाहता हॅू। दूसरों के सम्मुख गैरसैंण का पक्ष, मैं क्यों निर्णय नहीं ले पाया। ऐसा नहीं है, मैं उपरोक्त तथ्यों से परिचित नहीं था। मेरी सोच वर्ष 2000 में स्पष्ट थी, 2002 में भी स्पष्ट थी और 2014 में भी स्पष्ट थी और आज भी स्पष्ट है। समय, निर्णय शीलता को लचीला बना देता है। मैं प्रारम्भ से ही आपदा ग्रस्त मुख्यमंत्री रहा। सारे समय या तो आपदा से पैदा प्रश्नों का समाधान ढूंढता रहा या राजनैतिक आपदाओं से जूझता रहा। मेरी सरकार का संख्याबल अत्यधिक क्षीण व नाजुक था। समर्थन करने वालों को साथ लिये बिना कुछ भी करना निरर्थक था। राजनैतिक मजबूरी का यह दंश मुझे हमेशा सताता रहेगा। परन्तु मैंने विपरित हालात में भी धैर्य नहीं छोड़ा, लगातार ‘‘गैरसैंण कार्य योजना’’ पर काम करता रहा।

और 3 वर्ष के अपने कार्यकाल में, मैं कभी भी आम उत्तराखण्डी के यक्ष प्रश्न को नहीं भूला। भराड़ीसैंण में मेरी सरकार द्वारा निर्मित विधानसभा भवन किसी और को भी इस ‘‘यक्ष’’ प्रश्न को भूलने नहीं देगा। जब आप कमजोर होते हैं तो, आपको हर कदम सावधानी से उठाना पड़ता है। व्यापक स्वीकार्यता का मुलम्मा चढ़ाकर उठाना पड़ता है। मैंने पहला कदम गैरसैंण में टैन्ट में विधानसभा सत्र आयोजित कर उठाया। दिल्ली से देहरादून तक मेरे निर्णय की वैधानिकता व बुद्धिमत्ता पर सवाल उठे। मेरे मंत्रिमण्डल के साथियों व माननीय विधानसभा अध्यक्ष ने साथ व साहस दिया। देश के इतिहास में पहली बार टैन्ट में विधानसभा सत्र संपन्न हुआ। आधी रोटी खायेंगे-टैन्ट में सरकार चलायेंगे की दिशा में पहला ऐतिहासिक कदम बढ़ा। मेरी सरकार ने दो विधानसभा सत्र गैरसैंण व एक विधानसभा सत्र भराड़ीसैंण के विधानसभा भवन में संपन्न कराया। भराड़ीसैंण में हम सबने समवेत स्वर में राज्यगीत भी गाया जो भविष्य के उत्तराखण्ड की प्रेरणा है। यह गीत उत्तराखण्डियत की पहचान उच्चारित करती हुई जागर है।

मेरे मुख्यमंत्री पद ग्रहण करते वक्त तक गैरसैंण में पचास आगुन्तुकों के लिये रात्रि निवास खोजना कठिन था। मेरे पद मुक्त होते वक्त गैरसैंण व उसके आस-पास एक हजार लोगों के लिये रात्रि निवास करना सम्भव हो गया था। आदिबद्री से लेकर चौखुटिया तक सही दिशा की ओर बढ़ते राज्य के कदमों की छाप आप देख सकते हैं। आज भराड़ीसैंण में मंत्रियों-विधायकों व अधिकारियों के लिये आवास तैयार हैं। पेयजल योजना, सड़क, बिजली व हैलीपैड सबका उपयोग हो रहा है। गैरसैंण विकास परिषद अपने दो करोड़ के वार्षिक बजट से छोटे-बड़े काम करवा रही है। भराड़ीसैंण में बड़ा एरिया नोटिफाईड कर वहां टाउनशिप बनाने का काम यूहुड्डा नामक सरकारी संस्था को सौंपा गया है। 57 करोड़ रूपये की लागत से बनने वाले विधानसभा सचिवालय की नींव डाल दी गई है। निर्माण ऐजेन्सी तय है, दो करोड़ की राशि इस कार्य हेतु अवमुक्त की जा चुकी है और पाॅच सौ कर्मचारियों के लिये आवासीय कॉलोनी बनाने के कार्य का भी शिलान्यास किया गया है। गैरसैंण चारों तरफ से अच्छी सड़कों से जुड़े व यहां आवश्यक निर्माण कार्य पूरे हों, इस हेतु गैरसैंण अवस्थापना एंव सड़क निर्माण निगम का गठन किया गया है। चौखुटिया के डांग गाॅव में हवाई पट्टी बनाने का सुझाव भी मेरी ही सरकार ने भारतीय सेना व वायुसेना के अधिकारियों को दिया है। इस सुझाव पर काम हो रहा है। हमने मरचूला-भिकियासैन, दयोनाई-बछुवावान, ग्वालदम-बछुवावान, चीला-मेदाबन- -आदिबद्री (नयार के किनारे-2), शामा-ग्वालदम, सराईखेत-नगचूला खाल-पाण्डूखाल, पौड़ी-दुधातौली-भराड़ीसैंण तथा घुत्तु पांवली-तिरजुगी नारायण-सोनप्रयाग मोटर मार्गों के निर्माण व सुधारीकरण की स्वीकृतियां जारी की हैं। उद्देश्य गैरसैंण को चारों ओर से यथासम्भव सुचारू मोटर मार्गों से जोड़ना है।

उपरोक्त कुछ विनम्र कोशिशें हैं, जो मेरी सरकार ने प्रारम्भ की हैं। मुझे विश्वास है, ये कोशिशें आने वाले समय को हमारा भी स्मरण करवायेंगी। हमने चलाना तो प्रारम्भ किया था, खुद मंजिल तक पहुंचने के लिये। समय की बली हारी है, अब यहां से आगे दूसरों को बढ़ना है। मैं संतोष के साथ एक कवि की निम्न दो पंक्तियों को वर्णित कर आने वाले समय को व उत्तराखण्ड को शुभकामनायें दे रहा हूं।

‘‘कल और आयेंगे, नगमों की खिलती, कलियां चुनने वाले।

मुझसे बेहतर कहने वाले, मुझसे बेहतर करने वाले’’।।

जय उत्तराखण्ड

(हरीश रावत)

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