हरीश रावत का ब्लॉग- उत्तराखण्ड एक विहंगम परिदृश्य-‘‘पर्यटन’’

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देहरादून [उत्तराखंड पोस्ट ब्यूरो] उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने प्रदेश में पर्यटन की असीम संभावनाओं को लेकर अपने मन की बात कही है। हरीश रावत ने राज्य स्थापना के 17 वर्ष पूरे होने के मौके पर अपने फेसबुक पेज के जरिए अपने मन की बात को जनता के साथ साझा किया है।

हरीश रावत लिखते हैं कि उत्तराखण्ड के पास अपने 17 वर्षों की यात्रा के दौरान अर्जित उपलब्धियों पर गर्व करने को बहुत कुछ है। मैं इस गौरवगाथा का विश्लेषण अपने दोस्तो के लिये छोड़ता हॅू। इस लेख में, मैं उन पहलुओं पर एक विहंगम दृष्टिपात करना चाहता हूं। जहां हमें चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

रावत आगे लिखते हैं कि उत्तराखण्ड की प्रतिव्यक्ति औसत वार्षिक आय व सकल वार्षिक विकास दर, समकक्षी राज्यों के लिये अनुकरणीय है। मगर जब हम राज्य के अन्र्तक्षेत्रवार इस वृद्धि दर का विश्लेषण करते हैं तो सहज एक बड़ी चुनौती आ खड़ी होती है। यह चुनौती है अन्र्तक्षेत्रीय आर्थिक विषमता। हमारी तुलना में हिमाचल में यह विषमता लगभग नहीं है। हिमाचल में सीमान्त लाहोल-स्पिति, रोहड़ू जुब्बल आदि क्षेत्रों में प्रतिव्यक्ति औसत आय नाहन और कांगड़ा से अधिक है। हिमाचल अपने प्राकृतिक संशाधनों व मानव शक्ति के उपयोग में वैज्ञानिक सामंजस्य पैदा कर ऐसा सम्भव कर पाया है। जबकि हमारा ध्यान इस ओर केवल परिचर्चाओं व यदा-कदा बयानों व लेखों तक सीमित रहा है। यहि कारण है कि हमारे राज्य की सबसे कम प्रतिव्यक्ति औसत आय सीमान्त जनपदों व क्षेत्रों की है। इन क्षेत्रों के लिये एक विशेष प्रशासनिक विकास दृष्टि अपेक्षित है।

हरीश रावत अपने मुख्यमंत्रीकाल की बात करते हुए लिखते हैं कि उत्तराखण्ड ने 2015 के आस-पास इन क्षेत्रों को ध्यान में रखकर कई पहलें प्रारम्भ की और प्रशासनिक दृष्टिकोण को भी सिंगल लाईन एडमिनिस्ट्रेशन की तर्ज पर लाने का प्रयास किया। इस सोच को आगे बढ़ाने के लिये दो पृथक प्रशासनिक विभाग सीमान्त क्षेत्र व पिछड़ा क्षेत्र विकास गठित किये गये। मैं राज्य की इन नई पहलों पर फिर कभी लिखूंगा। इस वक्त मेरा ध्यान सीमान्त क्षेत्रों में विद्यमान अपनी धरोहरों पर है, जो हमारी तकदीर व तस्वीर दोनों को बदल सकती है। इन क्षेत्रों हमें अकूत प्राकृतिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक धरोहरों के साथ सृजनशील मानव शक्ति उपलब्ध है। राज्य की इन चारों धरोहरों के कल्पनाशील मुक्तियुक्त उपयोग पर राज्य की संतुलित उन्नति निर्भर है।

पूर्व सीएम आगे लिखते हैं कि वर्ष 2013 की त्रासदी ने जहां हमें बुरी तरह तोड़ा वहीं हमारे लिये प्राकृतिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक धरोहरों के समन्वयुक्त उपयोग का रास्ता भी खोला। त्रासदी के कारण देश व दुनिया का ध्यान हमारी ओर गया। मदद के तौर पर केन्द्र सरकार सहित अलग-2 श्रोतों से हमें आर्थिक मदद प्राप्त हुई हैं और यह मदद अब भी मिल रही हैं। हमारे राज्य में आने वाले पर्यटकों व आध्यात्मिक पर्यटकों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है। हमने अपने आगन्तुकों को चारधाम के साथ अन्य तीर्थ स्थलों, सांस्कृतिक मेलों के साथ जोड़ने की दिशा में काम प्रारम्भ किया है। मेरा विश्वास है उत्तराखण्ड के पास आध्यात्म, संस्कृति व प्रकृति के रूप में आगन्तुकों को परोसने के लिये बहुत कुछ है। राज्य के दोनों योग मेले ऋषिकेश व जागेश्वर बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटकों को आकृष्ट कर रहे हैं। इस श्रृंखला को और विस्तारित करने की जरूरत है और हमें एक पंजीकृत प्रशिक्षित योग प्रशिक्षकों का पैनल तैयार कर अपने नये पर्यटन गंतव्य स्थलों को नये योग केन्द्र के रूप में प्रचारित करना चाहिये। हमारा आध्यात्मिक व लेजर टूरिज्म सीजनल है।

हरीश रावत ने आगे कहा कि पिछले कुछ वर्षों से मसूरी, नैनीताल व कार्बेट से बाहर भी कुछ गंतव्य वीक एण्ड टूरिज्म गंतव्य के रूप में पर्यटकों की चाहत बने हैं। यदि हम वर्ष भर आगन्तुकों के स्वागत के लिये तैयार हैं तो हमें अपने चारधाम शीतकालिक वास स्थलों के आध्यात्मिक महत्व को प्रचारित करने की आवश्यकता है।

रावत अपने मुख्यमंत्री काल की एक और उपलब्धि का जिक्र करते हुए कहते हैं कि उत्तराखण्ड ने वर्ष 2016 में एक दूरदर्शी निर्णय लिया, शीतकालिक चारधाम यात्रा के संचालन का। इसको और प्रचारित करने तथा इसके साथ कुछ और तीर्थ स्थलों जो घाटियों में स्थित हैं, जोड़ने की आवश्यकता है। हम इन स्थलों के साथ सांस्कृतिक मेलों को जोड़ सकते हैं। हमारा शरदकालीन टूरिज्म कार्बेट से आगे कुछ सुन्दर वन क्षेत्र में बढ़ सकता है। जंगलों के साथ जुड़े पर्यटन को वर्ष भर विस्तारित करने की सोच के साथ ही राज्य द्वारा ईको टूरिज्म कॉरपोरेशन का गठन किया गया है। वर्ष 2015-16, 2017 में सभी प्रकार के पर्यटकों के आगमन के आकड़ों के आधार पर मेरा मानना है कि वर्ष 2020 तक इस संख्या को हम ढ़ाईगुना से भी अधिक बड़ा सकते हैं। राज्य ने वर्ष 2015 में एक सचेष्ट प्रयास प्रारम्भ किया था कि हम इन पर्यटकों, विषेशतः विदेशी पर्यटकों के एक हिस्से को अपने गांवों की सांस्कृतिक जिन्दगी से जोड़ें। होमस्टे का यह प्रयास विभिन्न होमस्टे समूहों द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है। यह प्रयास पिथौरागढ़ जिले की व्यास घाटी सहित कई क्षेत्रों में सफलतापूर्वक संचालित किया जा रहा है। आध्यात्मिक-सांस्कृतिक और प्राकृतिक चुनौती आधारित पर्यटन का सफल नमूना है। पुराना कैलाश, ओम पर्वत यात्रा है। ‘‘हिटो केदार’’ का अभियान इस सोच को आगे बढ़ाने का सामूहिक उच्चारण है। इस उदेश्य को और व्याख्याकृत करते हुये हमने दोर्ण पर्वत व सतोपंथ, बूढ़ाकेदार, बेदनी, द्याराबुग्याल ट्रेकिंग मार्गों को ट्रक ऑफ द ईयर घोषित किया। मेरा मानना है कि उत्तराखण्ड को एक बड़े प्रोजेक्ट के रूप में अपने अभी तक सर्वेकृत 85 ट्रेकिंग मार्गों को विकसित करना चाहिये और मुनस्यारी में स्थापित पंडित नैन सिंह पर्वता रोहण संस्थान को ट्रेकर्स ट्रेनिंग का दायित्व सौंपना चाहिये। राज्य सरकार ने अभी-2 ट्रेकर्स फीस को घटाने का अच्छा फैसला लिया है। हमें ट्रेकिंग को राज्य की आमदनी के बजाय रोजगार मूलक गतिविधि के रूप में लेना चाहिये। साहसिक पर्यटन के विभिन्न क्षेत्रों में सबसे अधिक रोजगार वर्धक विशेषतः सीमान्त क्षेत्रों के लिये ट्रेकिंग महत्वपूर्ण गतिविधि है। हिटो_केदार के नारे के साथ राज्य को ट्रैकर्स पैराडाईज बनाने की आवश्यकता है। उत्तराखण्ड ने एक महत्वपूर्ण पहल ईको टूरिज्म काॅरपोरेशन का गठन कर की है। इस संस्था को उपलब्ध वनवास स्थलों के विकास के साथ-2 ऐसे नये स्थलों जैसे प्राकृतिक फूल व फलों, पशु-पक्षियों, तितलियों के पार्क विकसित करने चाहिये ताकि पर्यटक मसूरी, नैनीताल से आगे अन्दर तक जाकर वास्तविक उत्तराखण्ड का आनन्द उठा सके। जायका के तहत वन विभाग ने वर्ष 2016 में एक ऐसा स्थल स्योनी (रानीखेत) के पास विकसित किया है।

उत्तराखण्ड ने वर्ष 2016 में रॉफ्टिंग व ऐरोस्पोर्टस, वाटर स्पोर्टस के लिये कुछ गनतब्यों गंतव्यों को छांटा व उन्हें विकसित करने का प्रयास किया है। दोनों विकास मण्डलों ने इस दिशा में युवाओं को प्रशिक्षण देना प्रारम्भ किया है। हमें अपने दोनों हाई एल्टिट्यूड खेल मैदानों-पौड़ी व मुनस्यारी का उपयोग विन्टर गेम्स व खिलाड़ियों की शाररिक क्षमता बढ़ाने के प्रशिक्षण केन्द्रों के रूप में करना चाहिये। मुझे दुःख है कि वर्ष 2016 में प्रारम्भ उत्तराखण्ड हवाईसेवा 2017 में बन्द कर दी गई है। राज्य की नई सरकार को अपनी पूर्व निर्मित हवाई पट्टियों व हैलीपैड्स का वाणिज्यिक उपयोग प्रारम्भ करना चाहिये और हो सके तो चौखुटिया में एक बड़ी हवाई पट्टी बनाने के लिये सेना व वायु सेना से बात करनी चाहिये। मैंने वर्ष 2016 में इस बिन्दु पर बातचीत की थी।

रावत आगे कहते हैं कि विचारों की श्रृंखला में बहुत सारे प्रयास मेरे ध्यान में आ रहे हैं जिन्हें उत्तराखण्ड ने पिछले कुछ समय में प्रारम्भ किया था। सांस्कृतिक मेलों, हाई एल्टिट्यूड स्पोर्टस, स्थानीय भोज्य, स्थानीय हस्तकला, पहनावा तथा आभूषण आदि ईको पर्यटन के विशेष अवयवों (कम्पोनेन्ट्स) के रूप में जोड़ने का प्रयास किया गया। इसे जोश के साथ आगे तक ले जाने की आवश्यकता है। मैं दो शब्द राज्यवासियों से भी कहना चाहूंगा। केवल ‘‘अतिथि देवो भवो’’ का लोगो पर्याप्त नहीं है। हमें मनसा-वाचा-कर्मणा से भी अतिथि स्वागती होना चाहिये ताकि एक बार आने वाला यहं बार-बार आवें। जरा सोचिये यदि हिमाचल के पास एक धाम या गंगा व हरिद्वार होता तो वहां का पर्यटन कितनी ऊंचाई पर होता। हमें उस ऊंचाई को छूने को वर्ष 2018 का संकल्प बनाना चाहिये।

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