…तो इस बार फिर से निर्दलीय और छोटे दल बनेंगे किंग मेकर !

देहरादून से आशीष तिवारी | उत्तराखंड में पल पल बदलते सियासी हालातों में अब निर्दलियों और छोटी पार्टियों की अहमियत बढ़ती जा रही है। टिकट बंटवारे के बाद बीजेपी और कांग्रेस में हुई बगावतों और बागियों के चुनावी मैदान में उतरने से राज्य में एक नया समीकरण बनता दिख रहा है। इस समीकरण में निर्दलियों का सियासी कद लगातार बढ़ता नज़र आ रहा है। अब ख़बरें एक क्लिक पर इस लिंक पर क्लिक कर Download करें Mobile App –https://play.google.com/store/apps/details?id=app.uttarakhandpost

उत्तराखंड में हो रहे चौथे विधानसभा चुनाव दिलचस्प होते जा रहें हैं। इन चुनावों में सियासी समीकरण तेजी से बदल रहें हैं। कल तक दिख रही सियासी तस्वीर अब रंग बदल चुकी है। इस तस्वीर में अब निर्दलियों और छोटी पार्टियों का रंग सबसे अधिक चटख होता जा रहा है।

king maker

राजनीतिक गलियारों में हो रहीं चर्चाएं बताती हैं कि इन चुनावों में कुछ करिश्मा हो जाए तो हैरान मत होइएगा। राज्य की कई विधानसभा सीटों पर इस बार मजबूत निर्दल उम्मीदवार हैं और उनकी जीत की संभावनाएं भी प्रबल दिख रहीं हैं। तो क्या ये माना जाए कि इस बार अब तक के चुनावों में जीतने वाले निर्दलीय प्रत्याशियों और छोटी पार्टियों के उम्मीदवारों की संख्या सबसे अधिक हो सकती है।

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वैसे राज्य में निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत का इतिहास इतना खराब भी नहीं रहा है –

  • 2002 में राज्य में 3 निर्दलीय उम्मीदवार जीत कर आए थे, कुल वोटों का 3 फीसदी इन प्रत्याशियों को मिला था।
  • यूकेडी जैसी छोटी पार्टी के जिम्मे 5 सीटें आईं थीं हालांकि वोट प्रतिशत बेहद कम तकरीबन 5 फीसदी ही था।
  • 2007 में 10 फीसदी वोटों के साथ 3 निर्दलीय उम्मीदवार जीत कर आए, जबकि यूकेडी को 3 सीटें मिलीं।
  • 2012 में भी 3 निर्दलीय उम्मीदवार जीते और उन्हें 3 फीसदी के करीब वोट मिले।
  • 2012 में यूकेडी पी का एक उम्मीदवार जीता जिसे कुल वोटों का 9 फीसदी वोट मिला।
  • हालांकि इस बार उम्मीद जताई जा रही है कि निर्दलियों का वोट फीसद भी बढ़ेगा और उनकी सीटें भी बढ़ सकतीं हैं। खासतौर पर उन सीटों पर जहां बगावत ने पांव पसार रखे हैं।

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