जानिए क्यों- मां गंगा का उद्गम स्थल ही नहीं, ये है सत्ता की भी गंगोत्री

680

गंगोत्री का नाम आते ही हर किसी के जेहन में मां गंगा के उदगम स्थल की बात आता है लेकिन उत्तराखंड में गंगोत्री सिर्फ मां गंगा का उदगम स्थल ही नहीं है बल्कि ये राज्य की सत्ता की भी गंगोत्री है। ये मिथक ही है कि अविभाजित उत्तर प्रदेश से लेकर अब तक इस विधानसभा सीट पर जिस पार्टी के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की है उस पार्टी की ही सरकार बनी है।

आजादी के बाद  देश में पहला आम चुनाव 1952 में हुआ, तब यह सीट गंगोत्री नहीं, उत्तरकाशी हुआ करती थी और पहले चुनाव में जयेंद्र सिंह बिष्ट निर्दलीय चुनाव जीते और फिर कांग्रेस में शामिल हो गए। तब उप्र में पं. गोविंद बल्लभ पंत के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी।

gangotri-temple

1957 के चुनाव में जयेंद्र निर्विरोध निर्वाचित हुए और कांग्रेस ही सत्तासीन हुई। 1958 में विधायक जयेंद्र की मृत्यु के बाद कांग्रेस के ही रामचंद्र उनियाल विधायक बने। इस बीच टिहरी रियासत का हिस्सा रहे उत्तरकाशी को वर्ष 1960 में अलग जनपद बनाया, लेकिन यह सियासी मिथक बरकरार रहा। 1977 में जनता पार्टी के प्रत्याशी बरफियालाल जुवांठा यहां चुनाव जीते तो सरकार जनता पार्टी की बनी।

1991 में भाजपा के ज्ञानचंद जीते और राज्य में भाजपा ने सरकार बनाई। 1996 में फिर ज्ञानचंद जीते तो सरकार भाजपा की आई।

नौ नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने के बाद भी यह मिथक बना रहा। ये बात अलग है कि सीट का नाम बदलकर उत्तरकाशी की जगह गंगोत्री कर दिया गया।

cong-bjp

उत्तराखंड में 2002 में हुए पहले विस चुनाव में इस सीट से कांग्रेस के विजयपाल सजवाण जीते तो सरकार कांग्रेस की बनी।

2007 में भाजपा के गोपाल सिंह रावत जीते तो सरकार बनी भाजपा की। 2012 में कांग्रेस के विजयपाल सजवाण ने भाजपा से यह सीट छीनी तो तब भी मिथक बरकरार रहा और कांग्रेस सत्तारूढ़ हुई।

प्रदेश में एक बार फिर से विधानससभा चुनाव होने जा रहे हैं। गंगोत्री विधानसभा सीट से इस बार भारतीय जनता पार्टी ने गोपाल सिंह रावत को मैदान में उतारा है तो कांग्रेस ने मौजूदा विजयपाल सिंह सजवाण पर फिर से भरोसा जताया है। ऐसे में एक बार फिर से सबकी निगाहें इस सीट पर है। ऐसे में देखना होगा कि आगामी विधानसभा चुनाव में यह मिथक टूटता है या नहीं।