सुप्रीम कोर्ट का फैसला, सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर अब कोई रोक नही

 केरल(उत्तराखंड पोस्ट ब्यूरो) केरल के सबरीमाला मंदिर में अब किसी भी उम्र की महिलाओं को जाने से रोका नहीं जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में हर उम्र वर्ग की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश का रास्ता खोल दिया है।  कोर्ट ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से पाबंदी हटा दी है।

सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर रोक की परंपरा संविधान के अनुच्छेद 26 के अनुकूल नहीं है। पूजापाठ में महिलाओं का भी बराबर का अधिकार है। जस्टिस नरीमन ने कहा कि सारे आयु वर्ग वाले भगवान अयप्पा के भक्त हैं और लिंग मंदिर में प्रवेश से रोकने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि महिलाएं पुरुषों से बिल्कुल भी कम नहीं हैं। एक तरफ तो हमारे देश में महिलाओं को देवी के रूप में पूजा जाता है, वहीं दूसरी ओर उनके मंदिर में जाने पर प्रतिबंध है।

फैसला पढ़ते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि भगवान के साथ संबंध जैविक या शारीरिक कारकों द्वारा परिभाषित नहीं किया जा सकता है। इस फैसले में चार जजों की राय एक समान है, जबकि महिला जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा  ने इस फैसले पर असंतोष जताया है। उन्होंने कहा कि भगवान अयप्पा के भक्त हिंदू हैं, एक अलग धार्मिक संप्रदाय का गठन न करें।जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा कि कोर्ट का वर्तमान फैसला सबरीमाला तक ही सीमित नहीं होगा, बल्कि इसका असर व्यापक होगा। उन्होंने कहा कि गहरी धार्मिक भावनाओं के मुद्दों पर आम तौर पर हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।

साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि धार्मिक प्रथाओं को समानता के अधिकार के आधार पर पूरी तरह से परीक्षण नहीं किया जा सकता है। यह पूजा करने वालों पर निर्भर करता है कि वो ये तय करें कि धर्म की आवश्यक प्रथाएं क्या हैं? ये अदालत तय नहीं कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद त्रावणकोर देवस्वाम बोर्ड के अध्यक्ष ए. पद्मकुमार ने कहा कि हम अन्य धार्मिक प्रमुखों से समर्थन मिलने के बाद कोर्ट के पास एक समीक्षा याचिका लेकर जाएंगे। वहीं, सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुजारी कंडारारू राजीवारू ने कहा कि निराश हूं, लेकिन महिलाओं के प्रवेश पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय स्वीकार है।

अगर किसी धार्मिक परंपरा शरीर की वजह से महिलाओं को प्रवेश से रोक उनकी गरिमा का उल्लंघन करती है तो वह असंवैधानिक है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि माहवारी की वजह से महिलाओं पर प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि अदालतों को उन धार्मिक प्रथाओं को वैधता प्रदान नहीं करनी चाहिए जो महिलाओं को अपमानित करती हैं।

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