अखंड सौभाग्य और संतान प्राप्ति के लिए सुहागिनें रखती है वट सावित्री व्रत, ऐसे करें पूजा

इस साल वट सावित्री व्रत 10 जून दिन गुरुवार को पूरी विधि-विधान से रखा जाएगा। इस दिन पूजा के दौरान वट सावित्री व्रत की कथा का श्रवण किया जाता है। 
 
Vat savitri
 

देहरादून (उत्तराखंड पोस्ट) हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। अखंड सौभाग्य के लिए महिलाओं का वट सावित्री व्रत मंगलवार से प्रारंभ हो रहा है। हिंदी पंचांग के अनुसार, वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को किया जाता है। इस दिन विवाहित औरतें वट वृक्ष की पूजा करती हैं। इस साल वट सावित्री व्रत 10 जून दिन गुरुवार को पूरी विधि-विधान से रखा जाएगा। इस दिन पूजा के दौरान वट सावित्री व्रत की कथा का श्रवण किया जाता है। 

वट सावित्री व्रत का महत्व- ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को सुहागिनें पति की लंबी आयु की कामना के लिए वट सावित्री व्रत रखती हैं। इस दिन वट यानी बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। महिलाएं वट को कलावा बांधते हुए वृक्ष की परिक्रमा करती हैं।

वट सावित्री व्रत पूजन सामग्री: बांस की लकड़ी से बना बेना (पंखा), अगरबत्ती या धूपबत्ती, लाल और पीले रंग का कलावा, पांच प्रकार के फल, बरगद पेड़, चढ़ावे के लिए पकवान, अक्षत, हल्दी, सोलह श्रंगार, तांबे के लोटे में पानी, पूजा के लिए साफ सिन्दूर और लाल रंग का वस्त्र पूजा में बिछाने के लिए।

पूजा विधि: इस दिन सुबह-सुबह महिलाएं जल्दी उठकर स्नान कर साफ सुथरे वस्त्र धारण कर लें। फिर सम्पूर्ण श्रृंगार करें। इसके बाद एक बांस या फिर पीतल की टोकड़ी में पूजा का सारा सामान रख लें और घर में ही पूजा करें। पूजा के बाद भगवान सूर्य को लाल पुष्प के साथ तांबे के बर्तन से अर्घ्य दें। इसके बाद घर के पास मौजूद वट वृक्ष पर जाएँ। वट वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें। देवी सावित्री को वस्त्र और श्रृंगार का सारा सामान अर्पित करें। पेड़ पर फल व पुष्प अर्पित करें। फिर वट वृक्ष को पंखा झेलें। इसके बाद रोली से वट वृक्ष की परिक्रमा करें। अंत में सत्यवान-सावित्री की कथा करें या सुनें। साथ ही पूरे दिन व्रत रखें। कथा सुनने के बाद भीगे हुए चने का बायना निकालकर उसपर कुछ रूपए रखकर सास को देने की भी प्रथा है। इस दिन ब्राह्मणों को वस्त्र तथा फल आदि वस्तुएं बांस के पात्र में रखकर दान करें।

वट सावित्री व्रत कथा - प्रसिद्ध तत्त्‍‌वज्ञानी अश्वपति भद्र देश के राजा थे। उनको संतान सुख नहीं प्राप्त था। इसके लिए उन्होंने 18 वर्ष तक कठोर तपस्या की, जिसके उपरांत सावित्री देवी ने कन्या प्राप्ति का वरदान दिया। इस वजह से जन्म लेने के बाद कन्या का नाम सावित्री रखा गया। कन्या बड़ी होकर बहुत ही रूपवान हुई। योग्य वर न मिलने की वजह से राजा दुखी रहते थे। राजा ने कन्या को खुद वर खोजने के लिए भेजा। जंगल में उसकी मुलाकात सत्यवान से हुई। द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पतिरूप में स्वीकार कर लिया।

इस घटना की जानकारी के बाद ऋषि नारद जी ने अश्वपति से सत्यवान् की अल्पआयु के बारे में बताया। माता-पिता ने बहुत समझाया, परन्तु सावित्री अपने धर्म से नहीं डिगी। जिनके जिद्द के आगे राजा को झुकना पड़ा।

सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया। सत्यवान बड़े गुणवान, धर्मात्मा और बलवान थे। वे अपने माता-पिता का पूरा ख्याल रखते थे। सावित्री राजमहल छोड़कर जंगल की कुटिया में आ गई थीं, उन्होंने वस्त्राभूषणों का त्यागकर अपने अन्धे सास-ससुर की सेवा करती रहती थी।

सत्यवान् की मृत्यु का दिन निकट आ गया। नारद ने सावित्री को पहले ही सत्यवान की मृत्यु के दिन के बारे में बता दिया था। समय नजदीक आने से सावित्री अधीर होने लगीं। उन्होंने तीन दिन पहले से ही उपवास शुरू कर दिया। नारद मुनि के कहने पर पितरों का पूजन किया।

प्रत्येक दिन की तरह सत्यवान भोजन बनाने के लिए जंगल में लकड़ियां काटने जाने लगे, तो सावित्री उनके साथ गईं। वह सत्यवान के महाप्रयाण का दिन था। सत्यवान लकड़ी काटने पेड़ पर चढ़े, लेकिन सिर चकराने की वजह से नीचे उतर आये। सावित्री पति का सिर अपनी गोद में रखकर उन्हें सहलाने लगीं। तभी यमराज आते दिखे जो सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे। सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे जाने लगीं।

उन्होंने बहुत मना किया परंतु सावित्री ने कहा, जहां मेरे पतिदेव जाते हैं, वहां मुझे जाना ही चाहिये। बार-बार मना करने के बाद भी सावित्री पीछे-पीछे चलती रहीं। सावित्री की निष्ठा और पतिपरायणता को देखकर यम ने एक-एक करके वरदान में सावित्री के अन्धे सास-ससुर को आंखें दीं, उनका खोया हुआ राज्य दिया और सावित्री को लौटने के लिए कहा। वह लौटती कैसे? सावित्री के प्राण तो यमराज लिये जा रहे थे।

यमराज ने फिर कहा कि सत्यवान् को छोडकर चाहे जो मांगना चाहे मांग सकती हो, इस पर सावित्री ने 100 संतानों और सौभाग्यवती का वरदान मांगा। यम ने बिना विचारे प्रसन्न होकर तथास्तु बोल दिया। वचनबद्ध यमराज आगे बढ़ने लगे। सावित्री ने कहा कि प्रभु मैं एक पतिव्रता पत्नी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है। यह सुनकर यमराज को सत्यवान के प्राण छोड़ने पड़े। सावित्री उसी वट वृक्ष के पास आ गईं, जहां उसके पति का मृत शरीर पड़ा था।

सत्यवान जीवित हो गए, माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई और उनका राज्य भी वापस मिल गया। इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भोगते रहे। अतः पतिव्रता सावित्री की तरह ही अपने सास-ससुर का उचित पूजन करने के साथ ही अन्य विधियों को प्रारंभ करें। वट सावित्री व्रत करने और इस कथा को सुनने से व्रत रखने वाले के वैवाहिक जीवन के सभी संकट टल जाते हैं।

डिसक्लेमर - 'इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।'

From around the web