हाईकोर्ट की सरकार को फटकार, कहा- बिना सैलरी काम करवाना अपराध

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने सैलरी को कर्मचारियों का संवैधानिक अधिकार बताते हुए आर्टिकल 23 का हवाला देते हुए कहा कि बिना पैसे के मजदूरी या बेगारी नहीं कराई जा सकती है।
 
high court

 

नैनीताल (उत्तराखंड पोस्ट) रोडवेज कर्मचारियों के वेतन मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वो परिसंपत्तियों के मामले में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों राज्यों बैठक कर निर्णय ले। कोर्ट ने सरकार से यह भी कहा कि जितना पैसा सरकार ने दिया है उससे दो महीने का ही वेतन मिल पा रहा है।

अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव से कहा कि जल्द कैबिनेट में निर्णय लेकर हाईकोर्ट को इसकी जानकारी दें। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने सैलरी को कर्मचारियों का संवैधानिक अधिकार बताते हुए आर्टिकल 23 का हवाला देते हुए कहा कि बिना पैसे के मजदूरी या बेगारी नहीं कराई जा सकती है।

आपको बता दें की रोडवेज कर्मचारी यूनियन ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर वेतन देने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि अगर वो सैलरी के लिए हड़ताल पर जाते हैं तो सरकार उनपर एस्मा के तहत कार्रवाई करती है। रोडवेज कर्मचारी यूनियन ने याचिका में यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार से 700 करोड़ की परिसंपत्तियों के बंटवारे का मिलना है। साथ ही सरकार ने 45 लाख केदारनाथ आपदा समेत अन्य की देनदारी सरकार पर है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा कि पूरी सैलरी क्यों नहीं दी गयी, इस पर अधिकारियों ने आर्थिक संकट का हवाला देते हुए कहा कि बोर्ड ने निर्णय लिया है कि वित्तीय स्थिति ठीक होने तक कर्मचारियों को आधी सैलरी देंगे। कोर्ट ने इसे लेकर फटकार लगाते हुए कहा कि क्या यह मान लिया जाए कि स्टेट पर वित्तीय संकट आ खड़ा हुआ है, और क्या ऐसे निर्णय बोर्ड को लेने का अधिकार कानून या संविधान देता है। अदालत ने कहा कि यह अपराध की श्रेणी में आता है।

सुनवाई के दौरान सरकार ने कोर्ट में बताया कि 34 करोड़ की धनराशि जारी की गई है जिससे अप्रैल-मई माह का वेतन दिया जा सकता है। कोर्ट ने सरकार के इस जवाब पर नाराजगी व्यक्त करते हुए पूछा कि आगे की क्या प्लानिंग है, वो भी कोर्ट को बताएं.

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