उत्तराखंड | गढ़वाल तो ‘वीर बडु का देस है’ 'बावन गढ़ का देस’ है: राजनाथ सिंह

राजनाथ सिंह ने कहा कि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली एक सच्चे सैनिक तो थे ही साथ ही वे एक प्रखर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे। उन्होंने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
 
Rajnath

 

पौड़ी (उत्तराखंड पोस्ट) केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शुक्रवार पौड़ी जिले में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में शिरकत की। राजनाथ सिंह ने स्मारक स्थल का लोकार्पण किया और वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के परिजनों को सम्मानित किया।

राजनाथ सिंह ने कहा कि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली एक सच्चे सैनिक तो थे ही साथ ही वे एक प्रखर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे। उन्होंने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।

राजनाथ ने आगे कहा कि उत्तराखंड की यह धरती भारत ही नहीं पूरी दुनिया में ‘देवभूमि’ के नाम से जानी जाती है। मगर यह देवभूमि एक ‘वीरभूमि और तपोभूमि’ भी है, यह हमें कभी नहीं भूलना चाहिए। वैसे तो राज्य का गठन हुए केवल बीस वर्षों का समय ही बीता है। यहां का इतिहास और परम्पराएं सदियों पुरानी हैं। यह गढ़वाल तो ‘वीर बडु का देस है’ 'बावन गढ़ का देस’ है। हर गढ़ में बहादुरी और पराक्रम के किस्से मशहूर हैं।

राजनाथ सिंह ने कहा कि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, माधो सिंह भंडारी और तीलू रौतेली की बहादुरी के गीत गढ़वाल के गांव-गांव में गाए जाते हैं। आज जिन वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की प्रतिमा का अनावरण यहां हो रहा है, वे कर्म और धर्म दोनों से सैनिक थे। अंग्रेजी हुकूमत में वह फौज के भर्ती हुए। वह दौर प्रथम विश्व युद्ध का था और अंग्रेजी फौज की तरफ से उन्हें लड़ने के लिए फ्रांस भेजा गया। भारतीय सैनिकों की बहादुरी, बलिदान और प्रोफेशनलिज्म का परिचय पूरी दुनिया को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुआ। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली न केवल फ्रांस में लड़े, बल्कि मेसोपोटेमिया में भी 1917 में उन्हें लड़ने के लिए भेजा गया।

धामी जी ‘धाकड़ बल्लेबाज’

इस दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि क्रिकेट की भाषा में अगर कहूं तो 20-20 के मैच में धामीजी को आखिरी ओवर में उतारा गया है। धामीजी काफी ‘धाकड़ बल्लेबाज’ हैं। उन पर उत्तराखंड के लोगों की बहुत सारी उम्मीदें टिकी हुई हैं। मुझे पूरी उम्मीद है कि वे इन उम्मीदों पर खरे उतरेंगे। कहा कि किसी भी देश या राज्य की नियति का फैसला वहां की सरकार की नीयत से ही तय होता है। मैं पुष्कर सिंह धामीजी को उनकी छात्र राजनीति के दिनों से जानता हूं। उनके पास ऊर्जा है, क्षमता है और कुछ कर गुजरने का जज्बा भी है।

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