भारतीय रेडियो प्रसारण का शताब्दी वर्ष: डिजिटल दौर में भी क्यों कायम है रेडियो का जादू? जानिए इसकी ताकत
लेखक- सुरेश वर्मा वरिष्ठ स. प्रोफेसर (रेडियो)
नई दिल्ली (Uttarakhand Post) उस अविस्मरणीय पल को याद कीजिए, जब आपने पहली बार आपने रेडियो देखा और उसका डायल घुमाकर या बटन दबाकर किसी कार्यक्रम को सुना था। उस रोमांच की क्या आज भी अनुभूति होती है जब उन मधुर गीतों, स्वरों, शब्दों और ध्वनियों ने आपको कल्पनाओं से निर्मित एक अद्भुत संसार में सरलता से पहुँचा दिया था। यही तो रेडियो की कला है, शक्ति है, जादू है—वह डर और एकाकीपन को दूर कर संगीत और ध्वनियों की मधुर लहरियों के माध्यम से श्रोता के मन को भाव विभोर कर आनंद, अपनत्व और उल्लास से भर देता है।
रेडियो को केवल सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का माध्यम नहीं समझा जाता, बल्कि जीवन के विषाद, कठिन और चुनौतीपूर्ण क्षणों में यह साहस, संबल और आशा का स्रोत भी बन जाता है। यह निराशा को आशा में बदलने का माध्यम है, कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति देने और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने की प्रेरणा प्रदान करने की भी क्षमता रखता है।
जिज्ञासु मन के लिए रेडियो यंत्र नहीं है बल्कि नए प्रश्नों को जन्म देता है, जो खोज, अनुसंधान और नवाचार की दिशा में प्रेरित करते हैं। रचनात्मक प्रतिभाओं के लिए यह नवसृजन का सशक्त मंच है और आत्म-अभिव्यक्ति का भी। मानव भावनाओं और सामाजिक मनोविज्ञान को समझने, प्रसारण और संवाद कला में दक्षता प्राप्त करने तथा प्रभावी मंच संचार की कला सीखने का इससे बेहतर माध्यम शायद ही कोई हो। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रेडियो यह सब अत्यंत सरल, सहज और सर्वसुलभ रूप में—पूर्णतः निःशुल्क—उपलब्ध कराता है। वास्तव में, रेडियो केवल ध्वनि का माध्यम नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने, विचारों को प्रेरित करने और जीवन को समृद्ध बनाने वाली एक अद्भुत शक्ति है।
रेडियो की शक्ति
आज विकसित और विकासशील—दोनों प्रकार के देशों में रेडियो का स्थान अत्यंत विशिष्ट, प्रभावशाली और महत्त्वपूर्ण है। यह केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति का संवाहक तथा हमारी सांस्कृतिक विरासत का सशक्त संरक्षक भी है। रेडियो ने लुप्तप्राय लोककलाओं और परंपराओं को जीवित रखने, संगीत की विविध विधाओं को लोकप्रिय बनाने तथा विज्ञापनों के माध्यम से वस्तुओं और सेवाओं की उपयोगी जानकारी जनसामान्य तक पहुँचाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।
हर्ट्ज़, मैक्सवेल, फैराडे और मार्कोनी जैसे महान वैज्ञानिकों के अद्भुत आविष्कारों एवं अनुसंधानों ने उस वैज्ञानिक आधारशिला का निर्माण किया, जिसके परिणामस्वरूप रेडियो का जन्म हुआ। बीसवीं शताब्दी के सबसे प्रभावशाली आविष्कारों में से एक रेडियो आज भी मानव सभ्यता के विकास की कहानी का अभिन्न अंग बना हुआ है। यद्यपि सामान्यतः रेडियो को मनोरंजन का माध्यम माना जाता है, किंतु इसके मूल में कार्य करने वाली रेडियो तरंगें विश्वभर में असंख्य वैज्ञानिक खोजों और तकनीकी नवाचारों की आधारशिला रही हैं। प्रारंभिक दिनों में इन्हीं रेडियो तरंगों ने समुद्र में नाविकों को तट से संपर्क स्थापित करने तथा युद्धक्षेत्र में सैनिकों को अपने मुख्यालय तक संदेश पहुँचाने और सहायता प्राप्त करने में सक्षम बनाया। आज सम्पूर्ण वैश्विक संचार व्यवस्था का आधार ही रेडियो तरंगें हैं। पुलिस के वॉकी-टॉकी, टेलीविजन प्रसारण, डीटीएच सेवाएँ, टीवी रिमोट, माइक्रोवेव ओवन, चिकित्सा विज्ञान में अल्ट्रासाउंड तकनीक, पनडुब्बियों का सोनार, हवाई जहाज़ों का रडार तथा उपग्रह संचार—ये सभी रेडियो तरंगों की अद्भुत देन हैं।
वर्तमान डिजिटल युग में भी रेडियो तरंगें वायरलेस संचार तकनीकों की रीढ़ बनी हुई हैं। वाई-फाई नेटवर्क, कॉर्डलेस कीबोर्ड, वायरलेस माउस, ब्लूटूथ स्पीकर, हेडफ़ोन तथा अनगिनत स्मार्ट उपकरण रेडियो-फ्रीक्वेंसी संचार के माध्यम से संचालित होते हैं। लगभग 1,86,000 मील प्रति सेकंड अर्थात प्रकाश की गति से यात्रा करने वाली रेडियो तरंगों ने बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी के असंख्य आविष्कारों, वैज्ञानिक खोजों तथा तकनीकी प्रगतियों को संभव बनाने में अमूल्य योगदान दिया है।
1920 में पीट्सबर्ग में विश्व के प्रथम व्यावसायिक रेडियो स्टेशन की स्थापना के साथ संगठित रेडियो प्रसारण का नया युग प्रारंभ हुआ। इसके बाद शीघ्र ही बीबीसी और वॉयस ऑफ अमेरिका जैसे विश्वविख्यात रेडियो नेटवर्क अस्तित्व में आए। भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत बॉम्बे रेडियो क्लब के प्रयासों से हुई। वर्ष 1927 में मुंबई में देश का पहला रेडियो स्टेशन स्थापित हुआ, जिसे 1936 में 'ऑल इंडिया रेडियो' के नाम से जाना जाने लगा। 1947 में देश के विभाजन के समय छह रेडियो स्टेशन भारत के हिस्से में आए, जबकि तीन पाकिस्तान को मिले। स्वतंत्रता के सात दशकों से अधिक समय बाद आज भारत विश्व के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रसारण तंत्रों में से एक है, जिसके 591 रेडियो स्टेशन देश के करोड़ों श्रोताओं तक पहुँच रहे हैं।
भारत मूलतः 'श्रुति' की संस्कृति का देश है, जहाँ वेदों और अन्य धार्मिक ग्रंथों को पहले सुना, स्मरण किया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से संप्रेषित किया गया; बाद में उन्हें लिपिबद्ध किया गया। यही समृद्ध श्रवण परंपरा भारतीय आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन में सुनने की महत्ता को अत्यंत गहराई से स्थापित करती है। इतिहास साक्षी है कि विश्व की लगभग प्रत्येक महान क्रांति बोले गए शब्दों की शक्ति से प्रेरित हुई। फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति और भारत का स्वतंत्रता संग्राम इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
यह तथ्य भी अत्यंत आश्चर्यजनक है कि एक शिशु जन्म लेने से पहले ही अपनी माता के गर्भ में सुनना प्रारंभ कर देता है। महाभारत के अभिमन्यु की कथा भारतीय परंपरा में श्रवण की इसी महत्ता का प्रतीक है, जिसने गर्भावस्था में ही युद्ध-कौशल का ज्ञान प्राप्त किया था। रेडियो मानव की इसी जन्मजात श्रवण क्षमता का एक अद्भुत विस्तार है। यह ध्वनि को ज्ञान, संवेदना, कल्पना और प्रेरणा में रूपांतरित कर देता है तथा मानव सभ्यता के सबसे प्रभावशाली, विश्वसनीय और कालजयी संचार माध्यमों में अपना विशिष्ट स्थान बनाए हुए है।
रेडियो की शैली
क्या रेडियो केवल ध्वनि तरंगों का प्रसारण मात्र है? बिल्कुल नहीं। रेडियो केवल मधुर गीतों के प्रसारण या मनोरंजक वार्तालापों तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक स्वरूप भारतीय दर्शन के उस महान आदर्श में निहित है— "बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय", अर्थात् ‘अधिकतम लोगों के हित और सुख के लिए’। शब्दों, संगीत, मौन और ध्वनि-प्रभावों के अद्भुत समन्वय के माध्यम से रेडियो इस महान उद्देश्य को साकार करता है और जन-जन के जीवन को समृद्ध बनाता है।
रेडियो की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विशिष्ट शैली और अभिव्यक्ति है। यह श्रोताओं के मानस-पटल पर जीवंत चित्र अंकित करता है, उनकी कल्पनाशक्ति को जागृत करता है, कभी हँसी की फुहार बिखेरता है तो कभी संवेदनाओं को इस प्रकार स्पर्श करता है कि आँखें नम हो जाती हैं। शब्दों, मधुर संगीत, ध्वनि-प्रभावों और सार्थक मौन का संतुलित संयोजन श्रोताओं को उसी भावभूमि तक पहुँचा देता है, जहाँ लेखक, प्रस्तुतकर्ता या गायक उन्हें ले जाना चाहता है। वास्तव में, मानव स्वर में ऐसी अद्भुत शक्ति निहित है, जो असंभव प्रतीत होने वाली भावनाओं को भी जीवंत अनुभव में बदल देती है।
रेडियो अपने आप में एक जीवंत संसार और विशाल परिवार है। इसमें लेखक, उद्घोषक, प्रस्तुतकर्ता, कलाकार, संगीतकार, गीतकार, वादक, अनुवादक, नाटककार, निर्माता, प्रबंधक, तकनीशियन, अभियंता और सबसे महत्वपूर्ण—करोड़ों समर्पित श्रोता—सभी समान रूप से सहभागी होते हैं। यह ऐसा माध्यम है जो बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक आयु वर्ग तक पहुँचता है—महिला और पुरुष, ग्रामीण और शहरी, संपन्न और वंचित, शिक्षित और अशिक्षित—सभी के जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। सचमुच, रेडियो सबका है और सबके लिए है।
रेडियो का कार्यक्षेत्र समाज के प्रत्येक आयाम और ज्ञान के लगभग प्रत्येक क्षेत्र तक विस्तृत है। यही कारण है कि यह सहजता से साहित्य से खेल तक, लोकगीतों से शास्त्रीय संगीत तक, हास्य से करुणा तक और पृथ्वी की गहराइयों से लेकर अंतरिक्ष की अनंत संभावनाओं तक श्रोताओं को यात्रा कराता है। इतिहास, संस्कृति, कृषि, मौसम, अर्थव्यवस्था, बजट, मनोविज्ञान, चिकित्सा, अभियांत्रिकी, विज्ञान और नवीनतम प्रौद्योगिकी—ऐसा कोई विषय नहीं है जिसे रेडियो ने अपने कार्यक्रमों के माध्यम से जनसामान्य तक न पहुँचाया हो।
मानव सभ्यता के विकास के इतिहास में रेडियो ने केवल संचार और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनकर ही नहीं, बल्कि हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए जीवनरेखा के समान है। सूचना, शिक्षा, प्रेरणा और मनोरंजन प्रदान करने के साथ-साथ रेडियो अपने अदृश्य तरंगों के माध्यम से मन को शांति, विश्राम, भावनात्मक संतुलन, नई ऊर्जा और आशा का संचार भी करता है।
रेडियो ने विश्वभर के देशों की अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी और राजनीति को भी गहराई से प्रभावित किया है। इसकी सरलता, सहजता, सर्वसुलभता, कम लागत, सार्वभौमिक स्वीकार्यता, शब्दों की प्रभावशाली शक्ति, सहयोगात्मक भावना और समाज से गहरा जुड़ाव इसे मानव इतिहास के सबसे विश्वसनीय और प्रभावशाली जनसंचार माध्यमों में से एक बनाते हैं।
पिछले नौ दशकों में भारतीय रेडियो प्रसारण ने स्वयं को एक संवादात्मक, ज्ञानवर्धक और मनोरंजक माध्यम के रूप में स्थापित किया है। समय के साथ यह समाज की बदलती आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के अनुरूप निरंतर विकसित होता हुआ एक सशक्त जनसंचार मंच बन चुका है।
आकाशवाणी विश्व के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रसारण संगठनों में से एक है। 591 से अधिक रेडियो स्टेशनों के माध्यम से यह भारत के लगभग 92 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र तथा 147 करोड़ से अधिक नागरिकों तक अपनी पहुँच रखता है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति इसकी भाषाई समृद्धि है। 23 भाषाओं और 182 बोलियों में प्रसारण करने की क्षमता इसे विश्व में अद्वितीय बनाती है। अपनी विदेश प्रसारण सेवा के माध्यम से आकाशवाणी 11 भारतीय तथा 16 विदेशी भाषाओं में लगभग 100 देशों तक भारत की संस्कृति, विचारधारा और संदेश का प्रसार करती है, जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की सांस्कृतिक और कूटनीतिक उपस्थिति और भी सुदृढ़ होती है।
रेडियो का परिवर्तित स्वरूप
रेडियो ने अपनी विकास-यात्रा में अनेक तकनीकी परिवर्तनों और नवाचारों के अद्भुत पड़ाव पार किए हैं। एक समय था जब बड़े-बड़े वाल्वयुक्त मर्फ़ी रेडियो प्रत्येक घर के बैठक-कक्ष की शान हुआ करते थे। परिवार के सभी सदस्य उसके चारों ओर बैठकर समाचार, संगीत और विविध कार्यक्रमों का आनंद लेते थे। समय के साथ इन विशाल उपकरणों का स्थान अधिक आधुनिक और छोटे आकार के सॉलिड-स्टेट रेडियो ने लिया, और फिर दो ड्राई-सेलों से चलने वाले हल्के एवं पोर्टेबल ट्रांजिस्टर रेडियो लोकप्रिय हुए। सचमुच, यह एक आश्चर्यजनक परिवर्तन था—ट्रंक के आकार के रेडियो से लेकर हाथ या जेब में समा जाने वाले उपकरण तक की यात्रा। इसके बाद कंधे पर लटकाए जाने वाले ट्रांजिस्टर का स्थान कानों में लगाए जाने वाले वॉकमैन ने लिया, जो इस कालजयी माध्यम के निरंतर विकास का प्रतीक था। आज रेडियो मोबाइल फ़ोन, इंटरनेट और डिजिटल एप्लिकेशनों के माध्यम से हमारी जेब तक पहुँच चुका है। इसकी पहुँच अब किसी भौगोलिक सीमा में बंधी नहीं रही; विश्व के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति रेडियो को सहजता से सुन सकता है।
विश्व के अधिकांश विकासशील देशों की लगभग तीन-चौथाई जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, जहाँ निरक्षरता, गरीबी, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और जागरूकता का अभाव जैसी अनेक चुनौतियाँ विद्यमान हैं। ऐसे परिदृश्य में सामाजिक परिवर्तन के माध्यम के रूप में रेडियो की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और अमूल्य हो जाती है। रेडियो में यह अद्भुत क्षमता है कि वह स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, पशुपालन तथा अन्य जनकल्याणकारी विषयों से संबंधित उपयोगी जानकारी ग्रामीण समुदायों तक उनकी अपनी भाषा या बोली में पहुँचाता है। इस प्रकार रेडियो केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन का एक सशक्त उत्प्रेरक बन जाता है, जो जमीनी स्तर पर विकास की नई संभावनाओं को जन्म देता है।
भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में शिक्षा और सूचना के प्रभावी माध्यम के रूप में रेडियो की उपयोगिता और महत्ता का आकलन करना कठिन है। अपने विस्तृत प्रसारण नेटवर्क के माध्यम से आकाशवाणी देशवासियों में राष्ट्र, उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, गौरवशाली परंपराओं और विकासोन्मुखी योजनाओं के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने की अपार क्षमता रखती है। देश के सबसे प्रभावशाली लोक-सेवा प्रसारण संस्थानों में से एक होने के कारण आकाशवाणी सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने, राष्ट्रीय एकता को सशक्त बनाने, आधुनिकीकरण को प्रोत्साहित करने तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास को गति देने में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान देने में सक्षम है।
आकाशवाणी अपने विविधतापूर्ण कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग और प्रत्येक आयु समूह तक पहुँचती है। संगीत, वार्ताएँ, परिचर्चाएँ, साक्षात्कार, रेडियो नाटक, कहानियाँ, समाचार, शैक्षिक प्रसारण, बाह्य प्रसारण और अनेक विशेष कार्यक्रम इसकी समृद्ध कार्यक्रम-संरचना का हिस्सा हैं। विश्व के बहुत कम प्रसारण संस्थानों के पास साहित्य, संस्कृति, संगीत और इतिहास से संबंधित इतना विशाल एवं बहुमूल्य ध्वनि-संग्रह उपलब्ध है। आकाशवाणी का यह अमूल्य अभिलेखागार केवल रिकॉर्डिंग्स का संग्रह नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, साहित्यिक और ऐतिहासिक विरासत का अनुपम राष्ट्रीय खजाना है, जिसकी समृद्धि और विविधता अद्वितीय है।
रेडियो की यात्रा उसकी जीवंतता, अनुकूलन क्षमता और सतत विकास का प्रेरणादायक प्रमाण है। समय और तकनीक के साथ स्वयं को निरंतर परिवर्तित करते हुए भी रेडियो ने लोगों को जोड़ने, शिक्षित करने, प्रेरित करने और समाज को सशक्त बनाने की अपनी मूल भावना को अक्षुण्ण बनाए रखा है।
रेडियो और ग्रामीण विकास
अनेक विकासशील देशों में रेडियो सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त उत्प्रेरक सिद्ध हुआ है। यह न केवल ग्रामीण समुदायों को अपने विकास की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करता है, बल्कि समयानुकूल, प्रासंगिक और उपयोगी जानकारी प्रदान कर उन्हें सशक्त भी बनाता है। चूँकि अधिकांश किसानों को औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिल पाता, इसलिए रेडियो एक प्रभावी वैकल्पिक शैक्षिक माध्यम के रूप में उनके ज्ञान का विस्तार करता है तथा आधुनिक कृषि तकनीकों और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों की समझ विकसित करता है।
जब रेडियो ग्रामीण नागरिकों को अपनी बात कहने, अपने अनुभव साझा करने और अपनी समस्याओं को अभिव्यक्त करने का मंच प्रदान करता है, तब वह उन्हें अपने जीवन को प्रभावित करने वाले सामाजिक मुद्दों और सरकारी नीतियों का गंभीरता से मूल्यांकन करने के लिए भी सक्षम बनाता है। उदाहरणस्वरूप, सरकारें रेडियो के माध्यम से नई कृषि एवं पशुपालन विकास योजनाओं और नीतियों का परिचय करा सकती हैं, उनके उद्देश्यों को स्पष्ट कर सकती हैं तथा उन पर जन-चर्चा और विचार-विमर्श को प्रोत्साहित कर सकती हैं। ऐसे कार्यक्रम किसानों से मूल्यवान सुझाव और प्रतिक्रियाएँ प्राप्त करते हैं, जिससे नीति-निर्माताओं को त्वरित एवं प्रभावी निर्णय लेने में सहायता मिलती है।
कृषि एवं पशुपालन विकास से संबंधित आवश्यक जानकारियों के प्रसार के लिए रेडियो एक अत्यंत प्रभावी माध्यम है। इसके माध्यम से किसानों को उन्नत कृषि तकनीकों, उच्च उत्पादकता वाले बीजों, समय पर बुवाई, वैज्ञानिक कटाई, मृदा संरक्षण, फसल प्रबंधन, कृषि विपणन, पशुओं के स्वास्थ्य, पशु-रोगों की रोकथाम, दुग्ध प्रबंधन तथा उत्पादन वृद्धि के उपायों की जानकारी सरल एवं व्यवहारिक रूप में उपलब्ध कराई जा सकती है। अपनी व्यापक पहुँच के कारण रेडियो वैज्ञानिक अनुसंधानों और तकनीकी नवाचारों को किसानों की समझ के अनुरूप सरल भाषा में प्रस्तुत करता है, जिससे वे उन्हें व्यवहार में आसानी से अपना सकें।
रेडियो की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह है कि वह किसी विशेष समुदाय, भौगोलिक क्षेत्र अथवा श्रोताओं के समूह को लक्षित कर सकता है। स्थानीय भाषा या बोली में प्रसारण करके यह सुनिश्चित किया जाता है कि विकास संबंधी संदेश स्पष्ट रूप से समझे जाएँ। सभी जनसंचार माध्यमों में रेडियो ही ऐसा माध्यम है, जो श्रोताओं की मातृभाषा में सहज, सरल और प्रभावी संवाद स्थापित करने की सर्वोत्तम क्षमता रखता है। इतना ही नहीं, यह जटिल वैज्ञानिक अवधारणाओं और तकनीकी नवाचारों को भी अत्यंत सरल भाषा में समझाने में सक्षम है, जिससे सीमित साक्षरता वाले लोग भी उन्हें आसानी से समझ सकें। यही विशेषता रेडियो को सामुदायिक विकास अभियानों में जनसहभागिता बढ़ाने और लोगों को विकास कार्यों से जोड़ने का अत्यंत प्रभावशाली माध्यम बनाती है।
संक्षेप में, रेडियो ग्रामीण विकास का एक अत्यंत प्रभावशाली उपकरण है। यह समुदायों की संचार आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए साझा मंच उपलब्ध कराता है तथा समयानुकूल, उपयोगी और व्यवहारिक जानकारी सबसे सरल, सहज और तीव्र गति से लोगों तक पहुँचाता है। यह ग्रामीण समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, आध्यात्मिक और आर्थिक आकांक्षाओं को स्वर देने के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण और संवर्धन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में रेडियो समुदायों को उन सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विषयों पर संवाद तथा निर्णय-प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी के लिए सशक्त बनाता है, जो उनके जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। यह एक व्यापक, सर्वसुलभ, किफायती और अत्यंत लोकप्रिय जनसंचार माध्यम है, जो जन-जागरूकता बढ़ाता है, स्थानीय समुदायों को संगठित होने के लिए प्रेरित करता है तथा लोगों को अपने विकास का भागीदार बनने के लिए उत्साहित करता है।
रेडियो एक लोकतांत्रिक मंच भी प्रदान करता है, जहाँ ग्रामीण समुदाय अपनी राय, आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को खुलकर व्यक्त कर सकते हैं तथा दूसरों की बात भी सुन सकते हैं। यह आधुनिक युग की चौपाल के रूप में कार्य करता है, जहाँ कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर संवाद, चर्चा और विचार-विमर्श होता है। इस प्रकार रेडियो सहभागी लोकतंत्र को सुदृढ़ करता है और जमीनी स्तर पर सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देता है।
रेडियो दूरस्थ क्षेत्रों में बोली जाने वाली विलुप्तप्राय भाषाओं और बोलियों के संरक्षण तथा संवर्धन में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रकार यह भाषाई विविधता और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा का सशक्त माध्यम बनता है। सामाजिक परिवर्तन में इसके व्यापक योगदान के कारण इसे सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी अभिकर्ता (Agent of Social Change) कहा जा सकता है।
इसके अतिरिक्त, रेडियो ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के प्रसार का भी एक अत्यंत प्रभावशाली माध्यम है। यह कृषि एवं पशुपालन संबंधी अनुसंधानों के निष्कर्षों को सरल भाषा में किसानों तक पहुँचाता है, अनुसंधान गतिविधियों पर समुदायों की प्रतिक्रियाओं को प्रसारित करता है तथा शोधकर्ताओं और ग्रामीण समाज के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करता है। कृषि, पशुपालन और कुटीर उद्योगों से जुड़ी तकनीकी आवश्यकताओं के संबंध में समुदायों से जानकारी एकत्रित कर रेडियो सरकारी संस्थाओं, अनुसंधान संगठनों और ग्रामीण समाज के बीच एक सशक्त सेतु का कार्य करता है। साथ ही, यह सहयोगात्मक अनुसंधानों की प्रगति और सफल नवाचारों का व्यापक प्रचार-प्रसार कर नई तकनीकों और सतत् ग्रामीण विकास को गति प्रदान करता है।
अंततः, ग्रामीण विकास में रेडियो की संभावनाएँ अत्यंत व्यापक और प्रेरणादायी हैं। यह केवल सूचना का प्रसार करने वाला माध्यम नहीं, बल्कि जनभागीदारी, आत्मनिर्भरता और सामुदायिक सशक्तीकरण का प्रभावी साधन है। रेडियो लोगों को केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि सोचने, संवाद करने, निर्णय लेने और विकास की प्रक्रिया में सक्रिय सहभागी बनने के लिए प्रेरित करता है। यही कारण है कि आज भी रेडियो समावेशी, सतत् और जन-केंद्रित विकास की दिशा में सबसे विश्वसनीय, सुलभ और प्रभावशाली संचार माध्यमों में से एक है।
रेडियो के सफ़र में 12 मील के पत्थर
23 जुलाई 1927 इंडियन ब्रॉडकास्ट कंपनी द्वारा भारत के पहले रेडियो स्टेशन का बॉम्बे में तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन द्वारा उद्घाटन किया गया. ये अलग बात है कि तीन वर्षों बाद आय न होने के कारण दिवालिया घोषित हो गयी और सरकार ने इसे अपने मंत्रालय में ले लिया.
8 जून 1936 कंट्रोलर ऑफ़ ब्राडकास्टिंग लिओनेल फिएलडॉन द्वारा इंडियन स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस का नाम बदल कर आल इंडिया रेडियो कर दिया. इस नाम ने विश्व के अग्रणी प्रसारण तंत्र में अपनी पहचान बनाई. आज़ादी के बाद 1956 में भारतीय प्रसारण का नाम ‘आकाशवाणी’ रखा गया.
12 नवम्बर 1947 राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी द्वारा आल इंडिया रेडियो के स्टूडियो से पहला व् अंतिम सजीव प्रसारण किया गया जिस तारीख को उनके सम्मान में राष्ट्रीय लोक प्रसारण दिवस के रूप में मनाया जाता है.
3 अक्तूबर 1957 आल इंडिया रेडियो की नवीन प्रसारण सेवा आरम्भ की गयी जिस का नाम था ‘विविध भारती’. इस का मुख्य लक्ष्य जनता का स्वस्थ मनोरंजन करना था. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारत की प्रमुख समाचार पत्रिका "इंडिया टुडे" ने विविध भारती को 50 सबसे महत्वपूर्ण और सुविख्यात चीजों में शामिल किया है जिसपर हर भारतवासी को गर्व अनुभव होता है. विविध भारती की जनसंख्या कवरेज 97 प्रतिशत है जो दूरदर्शन और डी टी एच टीवी चेनल से कहीं ज्यादा है. यह सेवा डी टी एच, मीडियम वेव, शोर्ट वेव व एफएम स्टेशनों पर उपलब्ध हैं. बच्चे से लेकर वरिष्ठ सदस्यों तक विविध भारती को बड़े उत्साह के साथ सुनते रहे है जिस के कारण विविध भारती ने आकाशवाणी द्वारा अर्जित कुल राजस्व का अधिकतम हिस्सा अर्जित किया है. हवा महल, पिटारा, जयमाला, संगीत सरिता, भूले बिसरे गीत , चित्रलोक आदि कार्यक्रमों की यादे आज भी श्रोताओ को गुदगुदाती है.
23 जुलाई 1977 भारतीय प्रसारण में पहली बार ऍफ़ एम् तकनीक का प्रयोग किया गया. पहला प्रसारण मद्रास से हुआ. अमेरीकी अभियंता एडविन आर्मस्ट्रांग ने 1933 में एफ० एम० तरंगो से रेडियो प्रसारण की तकनीक का आविष्कार कर लिया था परन्तु उस को जीवनकाल में इसके लिए विरोध ही सहन करना पड़ा.
30 अक्तूबर 1984 भारत में विकासात्मक संचार का नवीन सूत्रपात हुआ जब पहला स्थानीय रेडियो स्टेशन अस्तित्व में आया. लोकल रेडियो स्टेशन आल इंडिया रेडियो की सेवा है जो केवल 6 किलो वाट से स्थानीय लोगो तक उनकी उपयोगी सूचनाएं पहुंचाती है. पहला केंद्र तमिलनाडु में नागरकोइल से आरम्भ हुआ और 90 के दशक में देश भर में विस्तार होता गया. स्थानीय रेडियो स्टेशन छोटे क्षेत्र में काम करते हैं जिसका लक्ष्य संचार द्वारा विकास लाना होता है. इसका संचरण एफएम मोड में होता है व् प्रोग्रामिंग लचीला और सहज है. आज आल इंडिया रेडियो के 86 केंद्र स्थानीय प्रसारण सेवा प्रदान कर रहे है.
1985 भारतीय प्रसारण में एक क्रांतिकारी कदम था आल इंडिया रेडियो को सॅटॅलाइट इनसेट के माध्यम से जोड़ा जाना जिस से सूचनाओ को तीव्र व् स्पष्टता के साथ श्रोताओ तक पहुँचाने में मदद मिली. इसी का परिणाम है कि आज डी टी एच् के माध्यम से आल इंडिया रेडियो की सेवा विश्व भर में उपलब्ध है.
10 जनवरी 1993 रेडियो की शक्ति में विकास तब हुआ जब श्रोता जो अब तक केवल पत्रों के द्वारा अपनी बात रेडियो स्टेशन तक पहुंचाते थे उस में नया अध्याय शुरू हुआ. यह था फ़ोन इन कार्यक्रम जिस में श्रोता सजीव अपनी बात प्रस्तुतकर्ता से कर सकते थे. इस तकनीक ने एकल संचार को द्वीपक्षीय संचार में बदल दिया. श्रोता स्टूडियो में बैठे डाक्टर से स्वयं सवाल कर प्रतिक्रिया देने लगे.
23 नवम्बर 1997 भारतीय प्रसारण में एक तीव्र मोड़ आया जब प्रसार भारती बिल संसद से पास हुआ और आकाशवाणी व् दूरदर्शन को प्रसार भारती के अंतर्गत स्वतंत्र कार्यभार सौंपा गया. ये प्रसार भारती अधिनियम के तहत देश का लोक सेवा प्रसारक है जो 23 नवम्बर 1997 को अस्तित्व में आया.
जून 1999 प्रसार भारती के गठन के बाद एक कदम प्राइवेट एफ एम रेडियो स्टेशनों को प्रसारण की अनुमति दिया जाना था. इससे पहले, प्रयोग के आधार पर 1993 में सरकार ने रेडियो प्रसारण क्षेत्र को निजीकरण के लिए पहल की थी और उसने इंदौर, हैदराबाद, मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, विजाग और गोवा में निजी ऑपरेटरों को अपने एफएम चैनलों पर एयरटाइम ब्लॉक बेचा, जिन्होंने अपनी खुद की प्रोग्राम सामग्री विकसित की. यह प्रयोग भी बहुत सफल हुआ था. इस प्रकार 3 जुलाई, 2001 को रेडियो सिटी ने बंगलोर में पहले प्राइवेट एफएम रेडियो स्टेशन की स्थापना हुई.
1 फ़रवरी, 2004 भारतीय प्रसारण में एक तीव्र मोड़ तब आया जब विश्व के अनेक विकासशील राष्ट्रों की भांति भारत में भी सामुदायिक यानि कम्युनिटी रेडियो के द्वार खुल गए. अन्ना रेडियो चेन्नई से इसकी शुरुआत हुई जो बाद में शिक्षा संस्थानों के अतिरिक्त एन जी ओ एवं कृषि विकास केन्द्रों को भी रेडियो का लाइसेंस आबंटित किया जाने लगा. सामुदायिक रेडियो लोगो का लोगो द्वारा लोगो के लिए प्रसारण माना जाता है जो बेजुबान लोगो को स्वर प्रदान करता है. इन की संख्या वर्तमान में 200 है.
3 अक्तूबर, 2014 रविवार प्रात: 11 बजे आकाशवाणी से एक नए कार्यक्रम का सूत्रपात हुआ – मन की बात. इसे न केवल आल इंडिया रेडियो के सभी चैनल से प्रसारित किया गया बल्कि दूरदर्शन ने भी इसे अपने सभी चैनेल से रिले किया. रेडियो जगत के लिए ये न केवल सम्मान की बात थी, बल्कि इस कार्यक्रम ने रेडियो की शक्ति को भी स्थापित करने की दिशा में अनूठा योगदान दिया. 27 जनवरी, 2015 को अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी इस कार्यक्रम में भाग लिया जिसकी चर्चा पूरे विश्व में हुई. ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदीजी द्वारा हर माह किसी विषय पर विशेष श्रोता समूह को सम्भोधित किया जाता है और इसकी पहुँच दूर दराज के ग्रामीण व् किसानो तक होती है. 147 करोड़ की आबादी वाले इस देश की 68 प्रतिशत जनता आज भी गावों में निवास करती है. उन तक पहुँचने की शक्ति केवल एक ही माध्यम में है और वो है – रेडियो.
‘मन की बात’ से जन की बात
3 अक्तूबर 2014 को प्रारम्भ हुआ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ भारत में विकासात्मक प्रसारण को एक नई दिशा, नई ऊर्जा और नया उद्देश्य प्रदान करने वाला ऐतिहासिक संचार अभियान सिद्ध हुआ है। यह कार्यक्रम केवल सूचना प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य श्रोताओं के अंतर्मन को स्पर्श करना, उनकी चेतना को जागृत करना और उन्हें सकारात्मक परिवर्तन के लिए प्रेरित करना है। तथ्य और सूचनाएँ जहाँ बुद्धि का विकास करती हैं, वहीं किसी संवेदनशील और प्रेरक वाणी का वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देता है, जब वह मनुष्य के विचार, व्यवहार और जीवन-दृष्टि में सकारात्मक परिवर्तन का कारण बनती है।
‘मन की बात’ में संस्कृति, ग्रामीण विकास, शिक्षा, कन्या भ्रूण हत्या, स्वास्थ्य, स्वच्छता, जातीय भेदभाव, सुशासन, पर्यावरण संरक्षण तथा राष्ट्र निर्माण जैसे अनेक महत्वपूर्ण सामाजिक विषयों पर सार्थक संवाद किया जाता है। किसी भी समस्या का समाधान तभी संभव है जब उसे समस्या के रूप में स्वीकार किया जाए, उसके विभिन्न आयामों को समझा जाए तथा सामूहिक प्रयासों द्वारा उसका समाधान खोजा जाए। आज सूचना के असंख्य साधनों के युग में भी रेडियो का महत्व कम नहीं हुआ है। यह सकारात्मक सोच विकसित करता है, लोगों में उत्साह और कर्मशीलता का संचार करता है, सामाजिक मूल्यों को सुदृढ़ बनाता है तथा मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास को प्रोत्साहित करता है। आत्मबोध, आत्म-प्रबंधन और व्यवहार परिवर्तन के माध्यम से रेडियो विकास की प्रक्रिया को गति देता है तथा ग्रामीण आजीविका और सतत् विकास से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियों के प्रसार का प्रभावी माध्यम बनता है।
‘मन की बात’ अपने श्रोताओं को क्या प्रदान करता है? समाज के विभिन्न वर्गों का मानना है कि यह कार्यक्रम केवल सूचनाओं का स्रोत नहीं, बल्कि प्रेरणा, आत्मीयता, मानसिक संतुलन और अनौपचारिक शिक्षा का प्रभावशाली माध्यम है। समसामयिक विषयों पर प्रस्तुत सकारात्मक दृष्टिकोण अनेक लोगों की चिंताओं और अनिश्चितताओं को कम करता है। यह कार्यक्रम आत्मीय संवाद की शैली में उपयोगी विचारों और अनुभवों को सीधे श्रोताओं के मन तक पहुँचाता है तथा समाज में परस्पर विश्वास, सहयोग और सहभागिता की भावना को सुदृढ़ करता है।
यद्यपि इंटरनेट और डिजिटल मीडिया का विस्तार तीव्र गति से हुआ है, फिर भी रेडियो आज भी उन लोगों के लिए जीवनरेखा बना हुआ है जो डिजिटल संसाधनों से पूर्णतः नहीं जुड़े हैं। दूरदराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले लोग, सामाजिक रूप से वंचित वर्ग, वरिष्ठ नागरिक तथा एकाकी जीवन जीने वाले अनेक व्यक्तियों के लिए रेडियो आज भी सबसे विश्वसनीय साथी है। ‘मन की बात’ की स्थायी लोकप्रियता का आधार श्रोताओं के साथ स्थापित उसका भावनात्मक संबंध है। श्रोता कार्यक्रम के संदेशों को अपने जीवन से जोड़कर देखते हैं, परिवार और समाज में उन पर चर्चा करते हैं तथा अनेक बार उन्हें व्यवहार में भी उतारते हैं। निरंतर बढ़ती श्रोता संख्या इस कार्यक्रम के प्रति जनता के विश्वास, आत्मीयता और सक्रिय सहभागिता का प्रमाण है।
भविष्य की ओर देखते हुए ‘मन की बात’ आशा, एकता और सामूहिक सहभागिता का सशक्त प्रतीक बनकर उभरती है। यह कार्यक्रम यह प्रमाणित करता है कि सकारात्मक संवाद समाज में व्यापक परिवर्तन ला सकता है। जब संवाद हृदय से होता है, तब वह केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं करता, बल्कि व्यक्तियों और समाज दोनों में रचनात्मक परिवर्तन का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
‘मन की बात’ एक ऐसे निर्मल झरने के समान है, जो अपनी वाणी की मधुर धारा से जिज्ञासु, चिंतित और प्रेरणा की तलाश में भटकते मनों को शीतलता, आश्वासन और नई ऊर्जा प्रदान करता है। रेडियो की लोकप्रियता सदैव इस बात में रही है कि वह समाचार, संगीत, मनोरंजन और समाज की वास्तविक आवाज़ को एक सूत्र में पिरोकर जन-जन तक पहुँचाता है। ‘मन की बात’ ने इस गौरवशाली परंपरा को और अधिक सशक्त बनाया है। यह ऐसा लोकतांत्रिक मंच है जहाँ समाज के प्रत्येक वर्ग की सहभागिता सुनिश्चित होती है और श्रोता केवल श्रोता नहीं रहते, बल्कि परिवर्तन के सक्रिय भागीदार बन जाते हैं। इस प्रकार यह कार्यक्रम बौद्धिक, सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक स्तर पर जनचेतना के विकास का प्रभावी माध्यम बन गया है।
समय के साथ इस कार्यक्रम का प्रभाव श्रोताओं के विचारों, दृष्टिकोणों और व्यवहार में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। इसके प्रमुख परिणाम कई रूप में देखे जा सकते हैं—
- सरकारी नीतियों एवं विकासात्मक कार्यक्रमों के प्रति जन-जागरूकता, सहभागिता और विश्वास में वृद्धि।
- राजनीतिक एवं व्यक्तिगत दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन तथा रचनात्मक सोच का विकास।
- नागरिक उत्तरदायित्व, सामाजिक सहभागिता एवं जनसहयोग की भावना में वृद्धि।
- आर्थिक सुधारों, उद्यमिता तथा व्यावसायिक अवसरों के प्रति बेहतर समझ और जागरूकता।
- सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश में सकारात्मक परिवर्तन तथा सामुदायिक सहयोग की भावना का सुदृढ़ होना।
रेडियो की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह प्रत्येक श्रोता से व्यक्तिगत रूप से संवाद करता हुआ भी एक साथ करोड़ों लोगों तक पहुँच जाता है। आज उसकी पहुँच केवल बैठक या शयनकक्ष तक सीमित नहीं रही; वह रसोईघर, कार, अध्ययन कक्ष, खेत, बस, ट्रक, ढाबे, विद्यालय, पंचायत, कार्यस्थल और युवाओं की जेब में रखे मोबाइल फ़ोन तक पहुँच चुका है। सूचना, शिक्षा, मनोरंजन, प्रेरणा और मार्गदर्शन प्रदान करने वाला यह सबसे सरल, सुलभ, किफायती और प्रभावशाली संचार माध्यम है।
रेडियो का वास्तविक जादू उसकी ध्वनि में निहित है—चाहे वह प्रभावशाली वाणी हो, मधुर संगीत, जीवंत संवाद, प्रेरक कथन, ध्वनि-प्रभाव या गीत। रेडियो श्रोताओं के मानस-पटल पर जो कल्पना-चित्र निर्मित करता है, वे प्रायः दृश्य माध्यमों से भी अधिक प्रभावशाली, स्पष्ट, सुंदर और भावनात्मक होते हैं, क्योंकि उनका निर्माण श्रोता की अपनी कल्पना करती है। यही कारण है कि रेडियो की अनुभूति अत्यंत व्यक्तिगत, गहन और स्थायी होती है।
‘मन की बात’ ने भारत में रेडियो के पुनर्जागरण का सूत्रपात किया है। इस कार्यक्रम ने रेडियो माध्यम में नई ऊर्जा का संचार किया, डिजिटल युग में उसकी प्रासंगिकता को पुनः स्थापित किया तथा विकासात्मक संचार को नई गति और नई दिशा प्रदान की। यह कार्यक्रम इस सत्य का सशक्त प्रमाण है कि दृश्य और डिजिटल माध्यमों के प्रभुत्व वाले वर्तमान युग में भी मानवीय स्वर की शक्ति अद्वितीय है। प्रेरित करने, समाज को जोड़ने, राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने और राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया को सशक्त बनाने में रेडियो आज भी उतना ही प्रभावशाली है जितना अपने स्वर्णिम काल में था। ‘मन की बात’ का प्रत्येक प्रसारण हमें यह विश्वास दिलाता है कि सकारात्मक संवाद, जनसहभागिता और प्रेरणादायी नेतृत्व के माध्यम से एक सशक्त, समावेशी और विकसित भारत का निर्माण संभव है।
डॉ. सुरेश वर्मा देश के केंद्रीय विश्वविद्यालय में रेडियो विषय के प्रथम वरिष्ठ एसोसिएट प्रोफेसर हैं। उन्हें रेडियो प्रसारण एवं मीडिया अध्यापन के क्षेत्र में 37 से अधिक वर्षों का समृद्ध अनुभव प्राप्त है। उन्होंने 15 वर्षों तक आकाशवाणी में कार्यक्रम अधिकारी के रूप में भी सेवाएँ प्रदान की हैं।
Author's Email: skverma@jmi.ac.in