फुकरे 3 के 'मशहूर' गाने वाले अभिषेक नैलवाल अब कुमाऊँनी लोकसंगीत को देंगे नई पहचान
उत्तराखंड के स्थापना दिवस (9 नवंबर) के विशेष अवसर पर उत्तराखंड पोस्ट से बातचीत में अभिषेक नैलवाल ने अपने बचपन, संगीत की शुरुआती प्रेरणाओं, नानाजी डॉ. नारायण दत्त पालीवाल से मिले साहित्यिक संस्कारों, मुंबई तक के संघर्ष और अपने आगामी कुमाऊँनी लोकसंगीत प्रोजेक्ट पर खुलकर बात की।
देहरादून (Uttarakhand Post) उत्तराखंड से निकलकर मुंबई की संगीत दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले संगीतकार, गीतकार और गायक अभिषेक नैलवाल के लिए पहाड़ सिर्फ जन्मभूमि नहीं, बल्कि उनकी रचनात्मक पहचान का अभिन्न हिस्सा है।
फौजी परिवार में जन्म और देश के अलग-अलग हिस्सों में बचपन बिताने के बावजूद कुमाऊँ की बोली, लोकगीत, परंपराएं और सांस्कृतिक विरासत हमेशा उनके साथ रहीं। इसका श्रेय वह अपनी मां को देते हैं, जिन्होंने घर से दूर रहते हुए भी बच्चों को अपनी मिट्टी और संस्कृति से जोड़े रखा।
'फुकरे 3' के मशहूर गीत 'मशहूर' और 'सही है' को लिखने, कंपोज करने और अपनी आवाज देने से लेकर 'शमशेरा' के टाइटल ट्रैक में सुखविंदर सिंह के साथ आवाज मिलाने तक, अभिषेक ने हिंदी फिल्म संगीत में अपनी अलग पहचान बनाई है। 'बदास बबुआ' जैसे गीतों के जरिए भी उन्होंने श्रोताओं के बीच खास जगह बनाई।
लेकिन बॉलीवुड में सफलता के बीच उनकी एक ख्वाहिश हमेशा अधूरी रही—अपनी जड़ों, अपने पहाड़ और कुमाऊँनी लोकसंगीत को अपनी आवाज में दुनिया तक पहुंचाना। अब वह इसी सपने को साकार करने के लिए एक कुमाऊँनी लोक ईपी पर काम कर रहे हैं, जिसके पांच-छह गीत तैयार हो चुके हैं।
उत्तराखंड के स्थापना दिवस (9 नवंबर) के विशेष अवसर पर उत्तराखंड पोस्ट से बातचीत में अभिषेक नैलवाल ने अपने बचपन, संगीत की शुरुआती प्रेरणाओं, नानाजी डॉ. नारायण दत्त पालीवाल से मिले साहित्यिक संस्कारों, मुंबई तक के संघर्ष और अपने आगामी कुमाऊँनी लोकसंगीत प्रोजेक्ट पर खुलकर बात की।
इस खास बातचीत में उन्होंने यह भी बताया कि कैसे पहाड़ उनसे कभी दूर नहीं हुआ, क्यों लोकसंगीत पलायन के बीच नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम बन सकता है और उत्तराखंड के उन युवाओं को क्या करना चाहिए जो संगीत की दुनिया में अपना करियर बनाना चाहते हैं।
पेश है अभिषेक नैलवाल से उत्तराखंड पोस्ट की यह खास बातचीत:
प्रश्न 1. आप कुमाऊँ से हैं, लेकिन आपका बचपन एक आर्मी परिवार में देश के अलग अलग हिस्सों में बीता। ऐसे में पहाड़ से आपका रिश्ता कैसे बना रहा? घर में कुमाऊँनी बोली, खाना, गीत, इनमें से क्या क्या आपके साथ चलता रहा?
मैं जितना कुमाऊँनी होने पर, पहाड़ी होने पर गर्व करता हूँ, उतना ही खुशनसीब मानता हूँ कि मेरी परवरिश एक फौजी परिवार में हुई। पापा की पोस्टिंग पूरे देश में होती रही, तो मेरा बचपन एक तरह से भारत का दौरा बन गया। हर नई छावनी का मतलब था नई भाषा, नए त्योहार, नमस्ते कहने का नया तरीका। लेकिन फौज हमें जहाँ भी ले गई, पहाड़ हमारे साथ साथ चला। और इसका पूरा श्रेय मेरी माँ को जाता है। उन्होंने तय कर रखा था कि हम चाहे किसी भी राज्य में रहें, घर के अंदर पहाड़ ज़िंदा रहेगा। बोली उन्होंने सिखाई, गीत उन्होंने सिखाए, किस्से कहानियाँ उन्होंने सुनाईं। मुझे और मेरी बहन को कभी यह महसूस ही नहीं हुआ कि हम पहाड़ से दूर हैं।
और सच कहूँ तो संगीत मेरे लिए कभी कोई फैसला नहीं था। जहाँ तक याद जाती है, वह मेरे अंदर पहले से था। घर में पुराने फिल्मी गीत और ग़ज़लें चलती थीं, और उसी घर में एमटीवी पर माइकल जैक्सन और गन्स एन रोज़ेज़। एक कमरे में बेगम अख्तर, दूसरे में थ्रिलर। उसी मिश्रण ने मेरे कान बनाए। और इन सबके नीचे पहाड़ की लोककथाओं और धुनों का एक खिंचाव हमेशा रहा, जिसे मैं आज तक पूरी तरह समझा नहीं पाता। वह मेरे हर काम में अपने आप उतर आता है।
प्रश्न 2. आपके Nanaji हिंदी और कुमाऊँनी के कवि और लेखक थे। उनकी कविताओं और उनके व्यक्तित्व का आपके संगीत पर क्या असर पड़ा? क्या कोई एक याद, कोई एक पंक्ति है जो आज भी आपके साथ है?
मेरे नानाजी, डॉ. नारायण दत्त पालीवाल, दिल्ली प्रशासन में हिन्दी अकादमी के पूर्व सचिव एवं दिल्ली सरकार में पूर्व राजभाषा सचिव रह चुके हैं, और कुमाऊँनी संस्कृति और भाषा के बारे में काफ़ी लिखते थे और उसे उजागर करते थे। मुझे लगता है पूरा का पूरा असर उन्हीं से पड़ा, उन हिस्सों का भी जो उस वक़्त मुझे दिखे नहीं। और कविता मेरे परिवार की महिलाओं में भी बहती थी। मेरी माँ और मौसी, दोनों कविता के क्षेत्र में बहुत उम्दा काम कर रही हैं। मेरी नानी के घर में ऐसी शामें होती थीं जहाँ सब गाते थे, और वे महफ़िलें रात देर तक चलती थीं। बच्चे के तौर पर आप उसे ट्रेनिंग नहीं समझते। वह बस एक एहसास होता है जो आपके साथ चलता है।
उनसे जो सबसे बड़ी चीज़ मुझमें रह गई, वह है शब्दों के लिए सम्मान। जब आपके नानाजी लेखक हों, तो आप बहुत जल्दी सीख जाते हैं कि एक पंक्ति में कितना वज़न और कितनी ताक़त हो सकती है। आज भी जब मैं किसी गीत के लिए संगीत बनाता हूँ, तो सबसे पहले यही सुनता हूँ कि शब्द क्या कहना चाह रहे हैं।
कोई एक पंक्ति चुनना मुश्किल है, लेकिन उनसे मैंने सद्भावना, खुश रहना और सीधी बात करना ज़रूर सीखा है। जो याद सबसे ज़्यादा साथ रही, वह यही है कि हमारे घर में शब्द और सुर कभी अलग नहीं थे। शायद इसीलिए मैं आज गीत लिखता भी हूँ, बनाता भी हूँ और गाता भी हूँ।
प्रश्न 3. मुंबई में काम करने वाले कई संगीतकारों ने आपसे कहा है कि आपकी धुनों में एक "पहाड़ी टच" है, जबकि आप जानबूझकर ऐसा नहीं करते। यह पहाड़ी रंग क्या है? कुमाऊँनी लोकसंगीत की कौन सी बात है जो आपके अंदर बिना कोशिश के बैठी हुई है?
बरसों तक मैंने इसे एक सुखद संयोग माना। निर्देशक और साथी संगीतकार किसी ऐसे दृश्य की धुन सुनते जिसका पहाड़ से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं, और कहते, इसमें कुछ पहाड़ी है। मैंने कभी जानबूझकर नहीं किया। पहाड़ बस रिसकर मेरे हर काम में आ जाता है। एक जासूसी थ्रिलर में उतनी ही आसानी से, जितनी एक प्रेम गीत में।
यह रंग क्या है, इसे शब्दों में बाँधना मुश्किल है। शायद वह चार पाँच सुरों पर टिकी हुई सादगी, जिसमें एक पूरी ज़िंदगी समा जाती है। हमारे लोकगीत खेतों से, शादियों से, विदाई और शोक से होकर आए हैं, और उनमें पीढ़ियों का प्यार, इंतज़ार और मिट्टीपन जमा है। वही मेरे अंदर बैठा हुआ है।
प्रश्न 4. शमशेरा के टाइटल ट्रैक में सुखविंदर सिंह जी के साथ आपकी आवाज़ है, फुकरे 3 के "मशहूर" और "सही है" आपने लिखे, कम्पोज़ किए और गाए, और "बदास बबुआ" को लोग आज भी याद करते हैं। पहाड़ से निकले एक लड़के के लिए यह सफर कैसा रहा? क्या कभी लगा कि उत्तराखंड से होने की वजह से रास्ता आसान या मुश्किल हुआ?
सफ़र अविश्वसनीय रहा है, और उतना ही सुकून देने वाला। मैं आज भी मुंबई में उतना ही उत्साहित हूँ जितना उस दिन था जब बैग उठाकर यहाँ आया था। जिन लोगों को सिर्फ़ दूर से देखा और सुना था, उनके साथ काम करना। उन स्टूडियो में रिकॉर्ड करना जहाँ इस इंडस्ट्री के दिग्गजों ने काम किया है। उन लोगों से सीखना जिन्हें आप अपना आदर्श मानते हैं। उन लोगों से मैं मिला भी और उनके साथ काम भी किया, और मैं उन सबका बहुत शुक्रगुज़ार हूँ। जो भी इस शहर में आता है, उसके दिल में यही सब सपने होते हैं। मेरे साथ यह सब सच में हुआ। लगता है इस शहर ने मुझे उतना ही अपनाया जितना मैंने इसे चाहा।
लेकिन यह रास्ता सीधा नहीं था। दिल्ली में कॉलेज के दिनों में प्रिया सिनेमा के बाहर गिटार बजाते-बजाते मेरी पहली स्टूडियो रिकॉर्डिंग का रास्ता खुला था। और उसके बाद कई साल ऐसे गए जब मैं ऐसे गीतों के स्क्रैच वोकल गाता रहा जो बाद में दूसरों की आवाज़ में हिट हुए। वह दौर आपको विनम्र बना देता है। आप समझ जाते हैं कि ज़िंदगी में कुछ चीज़ें होती हैं, और आपको बहते रहना होता है।
प्रश्न 5. आप अब एक कुमाऊँनी लोक ईपी पर काम कर रहे हैं। यह फैसला कब और क्यों लिया? इसमें हम क्या सुनेंगे, पुराने लोकगीत, नई रचनाएँ, या दोनों? और क्या कुमाऊँ के पारंपरिक वाद्य, जैसे हुड़का या ढोल दमाऊँ, इसमें सुनाई देंगे?
कहना तो चाहूँगा कि इसकी शुरुआत किसी योजना से हुई, लेकिन असल में यह एक ऐसे एहसास से शुरू हुआ जो कभी गया ही नहीं। कुमाऊँनी लोकगीत गाने और पेश करने की इच्छा मेरे अंदर तब से है जब से मुझे याद है। बस यह हमेशा वह काम था जो "बाद में" होना था। अगली फिल्म के बाद, अगली डेडलाइन के बाद। और kai साल तक वह "बाद में" खिसकता रहा।
जो बदला, वह समय और थोड़ी सी किस्मत का मेल था। पिछले कुछ सालों में संगीतकार के तौर पर मेरे काम ने मुझे यह सोचने की जगह दी कि मैं अपने नाम से क्या कहना चाहता हूँ, और जवाब बार बार पहाड़ की तरफ लौटता रहा। जो गीत मैंने बचपन में सुने थे, वे मेरे अंदर पूरे के पूरे बैठे थे, बस इंतज़ार कर रहे थे। एक दिन आप यह पूछना बंद कर देते हैं कि आप तैयार हैं या नहीं, और बस रिकॉर्ड करना शुरू कर देते हैं। वहीं से यह ईपी शुरू हुआ। अभी पाँच छह गीत तैयार हैं।
इसमें क्या सुनेंगे, इस पर अभी ज़्यादा खोलना नहीं चाहता, क्योंकि गीत खुद बोलें तो बेहतर है। बस इतना कहूँगा कि इसमें पहाड़ की वह आवाज़ है जिसके साथ मैं बड़ा हुआ, और उसे आज के कानों तक पहुँचाने की कोशिश है। जड़ें पुरानी हैं, पेशकश आज की है। और पहाड़ के साज़ों की जो गूँज हमारे गीतों में हमेशा से है, उसे मैंने छोड़ा नहीं है।
मेरी उम्मीद बस इतनी है कि जो भी इसे सुने, उसे पहाड़ का सार और उन भावनाओं का एहसास हो जो यह संगीत अपने साथ लेकर चलता है। और इसकी खूबसूरती यह है कि दिल को जुड़ने के लिए कभी कभी शब्दों का अर्थ जानने की ज़रूरत भी नहीं होती।
प्रश्न 6. उत्तराखंड में पलायन एक बड़ा सवाल है, गाँव खाली हो रहे हैं और नई पीढ़ी शहरों में है। क्या आपको लगता है कि संगीत, और खासकर लोकसंगीत, इस पीढ़ी को अपनी जड़ों से दोबारा जोड़ सकता है? आपका ईपी इस बातचीत में कहाँ खड़ा होता है?
मैं खुद उसी पीढ़ी का हिस्सा हूँ जो पहाड़ से बाहर है, तो मैं इस सवाल पर किसी को उपदेश देने की स्थिति में नहीं हूँ। पर एक बात मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ। मैं पूरी ज़िंदगी पहाड़ से दूर रहा, और फिर भी पहाड़ मुझसे कभी दूर नहीं हुआ। क्योंकि मेरी माँ ने गीत और बोली मेरे अंदर डाल दिए थे। लोग गाँव छोड़ सकते हैं, नौकरी के लिए, पढ़ाई के लिए, मजबूरी में। लेकिन अगर गीत उनके साथ जाता है, तो पहाड़ उनके साथ जाता है। संगीत उस पुल का काम कर सकता है जो किसी नीति से नहीं बन पाता, क्योंकि वह दिल से होकर जाता है।
हमारे लोकगीत वैसे भी समय और दूरी का इतना लंबा सफर तय करके आए हैं। उनमें पीढ़ियों का प्यार, इंतज़ार और मिट्टीपन जमा है। मुझे लगता है जो युवा आज दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु में बैठा है, वह जब उसी गीत को आज की आवाज़ और आज के साज़ में सुनेगा, तो उसे लगेगा कि यह उसका है, उसके दादा दादी का नहीं। मेरा ईपी बस उसी कोशिश में खड़ा है। मैं यह नहीं कह रहा कि मेरे गीतों से कोई गाँव लौट आएगा। मैं इतना चाहता हूँ कि जो पहाड़ से दूर है, वह एक गीत सुनकर कम से कम अंदर से घर लौट आए। बाकी रास्ता वहीं से शुरू होता है।
प्रश्न 7. आज उत्तराखंड से कई गायक और संगीतकार राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहे हैं। आप पहाड़ के उन युवाओं से क्या कहना चाहेंगे जो संगीत में करियर बनाना चाहते हैं लेकिन उन्हें लगता है कि यह सब सिर्फ मुंबई में बैठकर ही हो सकता है?
सबसे पहले तो यह कि कोई नहीं जानता हिट कैसे बनती है। मुंबई में बैठा कोई भी नहीं। यही इस काम की खूबसूरती है और यही सच है। तो यह सोच कि मुंबई में कोई जादुई चाबी है, उसे दिमाग से निकाल दीजिए।
हाँ, मुंबई में मौके ज़्यादा हैं, स्टूडियो हैं, लोग हैं, और मैं खुद इसी शहर का कर्ज़दार हूँ। लेकिन आज जिस तरह से संगीत बनता और सुना जाता है, उसमें आप पहाड़ में बैठकर भी देश तक पहुँच सकते हैं। जो आपके पास है, वह मुंबई में किसी के पास नहीं है। आपके पास वह धुन है, वह बोली है, वह मिट्टी है। मैंने बरसों उसे छुपाकर रखा और आज उसी को सामने ला रहा हूँ। आप शुरू से ही उसे सामने रखिए।
दूसरी बात, असफलता से डरिए मत। या तो आप जीतते हैं, या सीखते हैं। मैंने कई साल ऐसे गीत गाए जो दूसरों की आवाज़ में मशहूर हुए। उस वक्त लगा था कि यह मेरा वक्त नहीं है, पर उसी दौर ने मुझे वह सब सिखाया जो आज मेरे काम आता है। अपनी अंतरात्मा की सुनिए, अगर नीयत साफ है तो दिल सही रास्ता दिखाता है। और सबसे ज़रूरी, काम में सच्चाई रखिए।
प्रश्न 8. 9 नवंबर को उत्तराखंड अपना स्थापना दिवस मनाएगा। इस मौके पर आप अपने प्रदेश के लोगों से क्या कहना चाहेंगे? और अगर आपको अपने पहाड़ के लिए एक गीत समर्पित करना हो, तो वह कैसा होगा?
अपने प्रदेश के लोगों से बस इतना कहना चाहूँगा कि हमारे पास जो है, वह दुनिया में बहुत कम लोगों के पास है। हमारी बोली, हमारे गीत, हमारी कहानियाँ, हमारे पहाड़। इन्हें अपने बच्चों तक पहुँचाइए, जैसे मेरी माँ ने मुझ तक पहुँचाया, चाहे आप पहाड़ में हों या पहाड़ से बहुत दूर। क्योंकि मैं अपने अनुभव से जानता हूँ कि जब गीत साथ चलता है, तो घर कभी पीछे नहीं छूटता। और जो युवा कुछ बनना चाहते हैं, उनसे यह कि आप जहाँ से हैं, वह आपकी कमज़ोरी नहीं, आपकी सबसे बड़ी ताक़त है। स्थापना दिवस की सबको बहुत-बहुत बधाई।
और गीत के बारे में मैं आपको बताऊँगा नहीं, बहुत जल्द आपको सुनने के लिए भेजूँगा, फिर आप बताइएगा कि आपको कैसा लगा। (मुस्कुराते हुए)
About Abhishek Nailwal: अभिषेक नैलवाल उत्तराखंड के कुमाऊँ से आने वाले संगीतकार, गीतकार और गायक हैं, जो मुंबई में रहते हैं। उन्होंने मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी (अमेज़न एमएक्स प्लेयर, 2026), मुखबिर: द स्टोरी ऑफ अ स्पाई (ज़ी5, 2022) और फिसड्डी (अमेज़न एमएक्स प्लेयर, 2024) का संगीत तैयार किया है। फुकरे 3 के गीत "मशहूर" और "सही है" उन्होंने लिखे, कम्पोज़ किए और गाए। गायक के तौर पर उनकी आवाज़ शमशेरा के टाइटल ट्रैक में सुखविंदर सिंह के साथ और बरेली की बर्फी के "बदास बबुआ" में सुनी जा सकती है। इन दिनों वे एक कुमाऊँनी लोक ईपी पर काम कर रहे हैं, जिसके ज़रिए वे पहाड़ के उन गीतों को नई पीढ़ी तक पहुँचाना चाहते हैं जिन्हें सुनते हुए वे बड़े हुए।