आरक्षण पर खुलकर बोले अजीत भारती, सरकार से मांगा पूरा हिसाब

 

नई दिल्ली (उत्तराखंड पोस्ट)जंतर-मंतर पर हाल में हुए ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के बाद देश में आरक्षण व्यवस्था, जाति व्यवस्था और सामाजिक न्याय को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इसी बीच स्वतंत्र पत्रकार अजीत भारती ने आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था, जातिगत पहचान और इसके भविष्य को लेकर अपने विचार सामने रखे हैं।

शालिनी कपूर तिवारी के पॉडकास्ट में भारती ने आरक्षण व्यवस्था की उपयोगिता और इसके मौजूदा स्वरूप पर कई सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आरक्षण सामाजिक असमानता से जुड़ी समस्या का राजनीतिक समाधान है, जबकि स्थायी समाधान के लिए सामाजिक और आर्थिक स्तर पर बदलाव जरूरी है।

मैं ब्राह्मण हूं, लेकिन उससे पहले पत्रकार हूं’

अपनी जातिगत पहचान से जुड़े सवाल पर अजीत भारती ने खुद को भूमिहार या भूमिहार ब्राह्मण समुदाय से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि उनकी पहचान केवल जाति तक सीमित नहीं है। भारती के मुताबिक, एक पत्रकार का काम समाज में मौजूद विसंगतियों और असमानताओं को सामने लाना है। उनका कहना है कि किसी मुद्दे पर सवाल उठाना किसी एक जाति या वर्ग के खिलाफ होना नहीं माना जाना चाहिए।

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आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर उठाए सवाल

अजीत भारती आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था को लेकर बेहद आलोचनात्मक रुख रखते हैं। उनका तर्क है कि यदि आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक और जातिगत पिछड़ेपन को खत्म करना है, तो लंबे समय के बाद इसके प्रभाव का व्यापक मूल्यांकन होना चाहिए। उन्होंने जातियों की सूची में बढ़ोतरी का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि अगर आरक्षण से सामाजिक पिछड़ापन लगातार कम हो रहा है, तो आरक्षण पाने वाली जातियों की संख्या और दायरा क्यों बढ़ता जा रहा है। हालांकि, इन दावों और आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि किया जाना जरूरी है।
 

‘आरक्षण का लाभ सभी वंचितों तक नहीं पहुंच रहा’

भारती ने अनुसूचित जाति समुदाय के भीतर आरक्षण के लाभ के असमान वितरण का मुद्दा भी उठाया। उनका दावा है कि SC आरक्षण का बड़ा हिस्सा कुछ अपेक्षाकृत प्रभावशाली जातियों तक सीमित रह जाता है, जबकि डोम, मुसहर और वाल्मीकि जैसी अत्यंत वंचित जातियों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। उनका सवाल है कि आरक्षण की व्यवस्था में उन समुदायों तक लाभ कैसे पहुंचाया जाए, जो आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे पीछे हैं।

इसी संदर्भ में वे आरक्षण के भीतर लाभ के वितरण का नियमित आंकड़ा सार्वजनिक करने और जातिवार प्रतिनिधित्व की पारदर्शी जानकारी उपलब्ध कराने की मांग करते हैं।
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क्रीमी लेयर और आर्थिक स्थिति पर भी सवाल

आरक्षण व्यवस्था में क्रीमी लेयर को लेकर भी भारती ने सवाल उठाए। उनका कहना है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से अपेक्षाकृत सक्षम परिवारों को लगातार आरक्षण का लाभ मिलने के बजाय वास्तविक रूप से वंचित लोगों तक अवसर पहुंचना चाहिए। उनके अनुसार, आरक्षण व्यवस्था का समय-समय पर डेटा के आधार पर मूल्यांकन होना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि किस वर्ग और समुदाय को कितना लाभ मिला है।
 

‘सरकार को आरक्षण पर श्वेत पत्र लाना चाहिए’

अजीत भारती की प्रमुख मांगों में आरक्षण व्यवस्था पर श्वेत पत्र जारी करना शामिल है। उनका कहना है कि सरकार को आंकड़ों के आधार पर यह स्पष्ट करना चाहिए कि पिछले दशकों में अलग-अलग जातियों और समुदायों को आरक्षण से कितना लाभ मिला। उनके मुताबिक, इस तरह के आंकड़े सार्वजनिक होने से आरक्षण को लेकर चल रही बहस अधिक तथ्यात्मक और पारदर्शी हो सकती है।
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EWS छात्रों के लिए अतिरिक्त सुविधाओं की मांग

भारती का कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS के छात्रों को केवल आरक्षण का लाभ देना पर्याप्त नहीं है। गरीब छात्रों को परीक्षा शुल्क में राहत, हॉस्टल की सुविधा और उच्च शिक्षा के लिए आसान वित्तीय सहायता जैसी सुविधाएं भी मिलनी चाहिए। उनका जोर इस बात पर है कि आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने में आने वाली वास्तविक बाधाओं को दूर किया जाए।
 

निजी क्षेत्र में आरक्षण के खिलाफ

अजीत भारती निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने के विचार का विरोध करते हैं। उनका तर्क है कि निजी क्षेत्र में नियुक्तियों का आधार योग्यता, कौशल और उत्पादकता होना चाहिए और निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने से आर्थिक गतिविधियों तथा प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ सकता है। यह मुद्दा हालांकि देश में लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय रहा है।
 

क्या आरक्षण पूरी तरह खत्म होना चाहिए?

आरक्षण को लेकर भारती का रुख तत्काल समाप्ति की बजाय दीर्घकालिक बदलाव की बात करता है। उनका कहना है कि आरक्षण संविधान में मौजूद व्यवस्था है और इसे एक दिन में खत्म करने की बात व्यावहारिक नहीं होगी।उनके अनुसार, आरक्षण अंततः सामाजिक असमानता की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इसके बजाय शिक्षा, रोजगार, आर्थिक सशक्तिकरण और लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के जरिए वंचित समुदायों को बराबरी के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

भारती का मानना है कि जब सामाजिक और आर्थिक असमानताएं पर्याप्त रूप से कम हो जाएं, तब आरक्षण जैसी विशेष व्यवस्थाओं की आवश्यकता पर नए सिरे से विचार किया जा सकता है।
 

आरक्षण पर बहस फिर तेज

जंतर-मंतर के आंदोलन और अजीत भारती जैसे सार्वजनिक वक्ताओं की टिप्पणियों के बाद आरक्षण को लेकर बहस एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई है। एक ओर आरक्षण को ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और असमानता दूर करने का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है, वहीं दूसरी ओर इसके लाभ के वितरण, क्रीमी लेयर और इसकी समय-समय पर समीक्षा की मांग भी उठती रही है।

अब बड़ा सवाल यही है कि आने वाले समय में आरक्षण व्यवस्था में कोई व्यापक बदलाव होता है या सरकार मौजूदा व्यवस्था को ही आगे जारी रखती है।