DNA टेस्ट ने उड़ाए होश, माता-पिता के नहीं निकले जुड़वा बच्चे; जालसाजी और लापरवाही का सनसनीखेज आरोप

राहुल का आरोप है कि अस्पताल ने जांच से बचने के लिए फर्जी कागजात तैयार किए हैं। उन्होंने दावा किया कि डोनर संबंधी जिन सहमति पत्रों (Consent Forms) पर उनके हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं, वे जाली हैं।
 

गुरुग्राम (Uttarakhand Post) आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के वरदान कहे जाने वाले आईवीएफ (IVF) तकनीक ने गुरुग्राम के एक दंपत्ति के जीवन में खुशियों की जगह एक ऐसा गहरा जख्म दे दिया है, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। राहुल और मीनू नामक इस दंपत्ति ने लंबी कोशिशों के बाद आईवीएफ का सहारा लिया, लेकिन डीएनए (DNA) टेस्ट की रिपोर्ट ने उनके होश उड़ा दिए—उनके घर आईं दो प्यारी जुड़वा बच्चियां उनकी जैविक संतान नहीं हैं। शालिनी कपूर तिवारी (Shalini Kapoor Tiwari) के Podcast में राहुल और मीनू ने अपनी दर्द भरी दास्तां शेयर करते हुए न्याय की गुहार लगाई है।

अस्पताल और डॉक्टरों पर गंभीर आरोप- पीड़ित दंपत्ति ने दिल्ली के अस्पताल और वहां की डॉक्टर पर लापरवाही और धोखाधड़ी के गंभीर आरोप लगाए हैं। मीनू ने जनवरी 2026 में द्वारका के मैक्स अस्पताल में जुड़वा बच्चियों को जन्म दिया था। जब बच्चियों की शक्ल परिवार के किसी सदस्य से नहीं मिली, तो दंपत्ति ने डीएनए टेस्ट कराने का फैसला लिया। लैब की रिपोर्ट में यह स्पष्ट हो गया कि न तो राहुल और न ही मीनू उन बच्चियों के जैविक माता-पिता हैं।

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फर्जी कागजातों और हस्ताक्षर का खेल- राहुल का आरोप है कि अस्पताल ने जांच से बचने के लिए फर्जी कागजात तैयार किए हैं। उन्होंने दावा किया कि डोनर संबंधी जिन सहमति पत्रों (Consent Forms) पर उनके हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं, वे जाली हैं। रिकॉर्ड के अनुसार, 14 मई 2025 को जिस समय मीनू ऑपरेशन थिएटर में थीं और उन्हें एनेस्थीसिया दिया जा चुका था, उसी समय के हस्ताक्षर कागजों पर दिखाए गए हैं, जो तार्किक रूप से असंभव है।

सिस्टम की उदासीनता और जांच में देरी- पीड़ित परिवार का कहना है कि वे पिछले छह महीनों से न्याय के लिए पुलिस, कोर्ट और स्वास्थ्य विभाग के चक्कर काट रहे हैं। राहुल ने आरोप लगाया कि कोर्ट के आदेश के बावजूद पुलिस और एआरटी (ART) विभाग मामले की सही जांच नहीं कर रहे हैं और केवल खानापूर्ति की जा रही है। उन्होंने यह भी बताया कि अस्पताल द्वारा उन्हें पैसे और 'इललीगल सरोगेसी' का ऑफर देकर चुप कराने की कोशिश की गई, जबकि पुलिस उन पर मानसिक दबाव बना रही है।

चाइल्ड ट्रैफिकिंग का डर- हाल ही में दिल्ली में बच्चों की खरीद-फरोख्त (चाइल्ड ट्रैफिकिंग) के एक बड़े गिरोह के पकड़े जाने के बाद यह परिवार और भी दहशत में है,। मीनू ने भावुक होकर कहा, "हमें बस इतना पता लग जाए कि हमारे अपने बच्चे कहां हैं और क्या वे किसी अच्छे परिवार के पास सुरक्षित हैं"। उन्हें डर है कि उनके बच्चों को कहीं बेच तो नहीं दिया गया।

एक भावुक अपील दंपत्ति ने उन सभी जोड़ों से सामने आने की अपील की है जिन्होंने 14 मई 2025 को एससीआई अस्पताल में एम्ब्रियो ट्रांसफर कराया था या 5 जनवरी 2026 को मैक्स अस्पताल, द्वारका में जिनके जुड़वा बच्चे पैदा हुए थे,। उनका मानना है कि डीएनए टेस्ट के माध्यम से ही सच्चाई सामने आ सकती है और उनके बच्चों का पता लग सकता है।

फिलहाल, यह मामला चिकित्सा नैतिकता और कानूनी व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करता है। दंपत्ति की मांग है कि सरकार एक एसआईटी (SIT) गठित कर इस पूरे 'सिंडिकेट' की निष्पक्ष जांच कराए