भारत में अब हीटवेव भी प्राकृतिक आपदा, सरकार के फैसले से क्या बदलेगा?
दिल्ली(उत्तराखंड पोस्ट) भारत सरकार ने हीटवेव (लू) और आकाशीय बिजली को अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की सूची में शामिल कर लिया है। इस फैसले के बाद राज्यों को लू और बिजली गिरने से प्रभावित लोगों के लिए राहत एवं बचाव कार्यों में SDRF और NDRF से वित्तीय सहायता लेने का स्पष्ट आधार मिलेगा। यह निर्णय जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रही अत्यधिक गर्मी और आकाशीय बिजली जैसी घटनाओं से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य सरकारें अब आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत राहत और जोखिम कम करने वाली योजनाओं को अधिक प्रभावी तरीके से लागू कर सकेंगी।
2026 में हीटवेव से कितनी मौतें हुईं?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1 मार्च से 26 जुलाई 2026 के बीच देश में हीटस्ट्रोक से कम से कम 20 लोगों की मौत हुई। इनमें अकेले महाराष्ट्र में 11 मौतें दर्ज की गईं।इसी अवधि में तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा, मध्य प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक समेत कई राज्यों में लगभग 5,000 लोग हीटस्ट्रोक से प्रभावित हुए। मार्च से जुलाई 2026 के बीच सरकारी निगरानी प्रणाली में 4,853 से अधिक हीटस्ट्रोक के मामले दर्ज किए गए।
अब राज्यों को क्या फायदा मिलेगा?
केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, 2026-31 की अवधि के लिए SDRF और NDRF के संचालन संबंधी दिशानिर्देशों में हीटवेव और आकाशीय बिजली को अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की सूची में शामिल किया गया है। यह बदलाव 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर किया गया है। आयोग ने जलवायु परिवर्तन के चलते चरम मौसम की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता को देखते हुए इन दोनों घटनाओं को अधिसूचित आपदा बनाने की सिफारिश की थी।
अब राज्य सरकारें:
- हीटवेव और आकाशीय बिजली से प्रभावित लोगों के लिए राहत कार्य कर सकेंगी।
- SDRF से निर्धारित प्रावधानों के तहत वित्तीय सहायता का इस्तेमाल कर सकेंगी।
- बड़े संकट की स्थिति में NDRF से अतिरिक्त सहायता मांग सकेंगी।
- हीटवेव से बचाव और जोखिम कम करने वाली परियोजनाओं के लिए आपदा न्यूनीकरण कोष का उपयोग कर सकेंगी।
पहले क्या था नियम?
अब तक हीटवेव आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत अधिसूचित प्राकृतिक आपदाओं की सूची में शामिल नहीं थी। इस सूची में चक्रवात, सूखा, भूकंप, आग, बाढ़, सुनामी, ओलावृष्टि, भूस्खलन, हिमस्खलन, बादल फटना, कीटों का हमला और पाला/शीत लहर जैसी आपदाएं शामिल थीं। राज्यों को अपने स्तर पर हीटवेव को अधिसूचित करना पड़ता था। राहत कार्यों के लिए SDRF के वार्षिक आवंटन का अधिकतम 10 प्रतिशत तक ही इस्तेमाल किया जा सकता था।नए प्रावधान के बाद राज्यों के पास हीटवेव से निपटने के लिए अधिक स्पष्ट और व्यापक वित्तीय ढांचा उपलब्ध होगा।
आकाशीय बिजली क्यों है बड़ी चुनौती?
भारत में मौसम संबंधी प्राकृतिक आपदाओं में आकाशीय बिजली सबसे ज्यादा जानलेवा घटनाओं में शामिल है। हर वर्ष इससे करीब 2,000 से 2,500 लोगों की मौत होती है। आकाशीय बिजली से होने वाली लगभग 96 प्रतिशत मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में दर्ज की जाती हैं। इसका सबसे अधिक खतरा खुले खेतों में काम करने वाले किसानों, खेतिहर मजदूरों और ग्रामीण समुदायों को रहता है। बिहार और ओडिशा जैसे प्रभावित राज्यों में हर वर्ष राहत और मुआवजे पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। इसके अलावा पशुधन, कृषि और बिजली ढांचे को भी नुकसान पहुंचता है।
किन राज्यों और क्षेत्रों में ज्यादा खतरा?
पूर्वी भारत और छोटानागपुर पठार
ओडिशा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल आकाशीय बिजली से प्रभावित प्रमुख राज्यों में हैं। बंगाल की खाड़ी से आने वाली नम हवा और स्थलीय शुष्क हवा के टकराव से तेज संवहनी बादल बनते हैं, जिससे बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत
राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में गर्मियों के दौरान हीटवेव का खतरा अधिक रहता है। कई इलाकों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर पहुंच जाता है।
पश्चिमी और दक्कन क्षेत्र
महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा, तेलंगाना और उत्तरी कर्नाटक को गर्मी और आकाशीय बिजली दोनों का सामना करना पड़ता है। गर्मी की शुरुआत में भीषण लू और मानसून से पहले बनने वाले संवहनी तूफान यहां जोखिम बढ़ाते हैं।
पूर्वोत्तर भारत
असम, मेघालय, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में भी आकाशीय बिजली की घटनाओं की आवृत्ति अधिक रहती है। हिमालय की तलहटी और पहाड़ी ढलानों के कारण होने वाली संवहनी गतिविधियां इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
हीटवेव को प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में शामिल किए जाने से इसे केवल स्वास्थ्य संबंधी चुनौती के बजाय आपदा प्रबंधन और जलवायु जोखिम के नजरिए से भी देखा जाएगा। इससे राज्यों को गर्मी से होने वाली मौतों और नुकसान को कम करने के लिए राहत, तैयारी और जोखिम न्यूनीकरण की योजनाओं पर अधिक संसाधन लगाने में मदद मिल सकती है।
बढ़ते तापमान और बदलते मौसम के बीच यह फैसला भारत में जलवायु आपदा प्रबंधन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।