गंगोत्री | करोड़ों लोगों की आस्था की केंद्र है गंगा, जानिए महिमा

गंगोत्री (उत्तराखंड पोस्ट ब्यूरो) विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है भारतीय संस्कृति। इस संस्कृति के आरंभ से लेकर वर्तमान तक जितने भी परिवर्तन हुए हैं उन सब की साक्षी है गंगा। अब ख़बरें एक क्लिक पर इस लिंक पर क्लिक कर Download करें Mobile App – उत्तराखंड पोस्ट

ये वही गंगा है जिसे लोग भागीरथी, मंदाकिनी, सुरसरिता, देवनदी और जाहनवी के नाम से सिर्फ जानते ही नहीं वरन गंगा चिरकाल से लेकर वर्तमान तक करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र भी है। ये वही गंगा है जो मनुष्य के जन्म से लेकर मरण तक और पाप से लेकर पुण्य तक सदैव किसी न किसी रुप में लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है।

gangotriउत्तराखंड की चारों धामों में गंगोत्री धाम का भी बड़ा महत्व है। गंगोत्री धाम समुद्र तल से 3042 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। संपूर्ण गंगोत्री यात्रा का मार्ग भागीरथी नदी के मुहानों से होकर जाता है। भागीरथी नदी कहीं बहुत संकरी ओर वेगमयी है तो कहीं वृहद है ओर कहीं कहीं तो ये बिलकुल ही अदृश्य हो जाती है।

गंगोत्री धाम के कपाट भक्तों के दर्शन के लिए हर साल अक्षय तृतीया से दीपावली तक मई से अकटूबर के मध्य 6 माह के लिए खुलते हैं। इस दौरान देश विदेश से लाखों श्रद्धालु मां गंगा के दर्शन के लिए गंगोत्री पहुंचते हैं। 18वीं सदी की शुरुआत में गोरखा कमांडर अमर सिंह थापा ने मां गंगा के मंदिर का निर्माण करवाया था।

12961495_212459112456492_2239110986772283696_nपौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्री राम के पूर्वज रघुकुल के चक्रवर्ती राजा भगीरथ ने यहां एक पवित्र शिलाखंड पर बैठकर भगवान शंकर की प्रचंड तपस्या की थी। भगवान शिव इस स्थान पर अपनी जटाओं को फैलाकर बैठ गए और उन्होने गंगा माता को अपनी जटाओं में लपेट लिया। शीतकाल के आारंभ में जब गंगा का जलस्तर इस स्थान पर काफी नीचे चला जाता है तब श्रद्धालुओं को पवित्र शिवलिंग के दर्शन होते हैं।

गंगोत्री मंदिर से नीचे की ओर भागीरथी शिला है जिस पर यहां पिण्डदान आदि कर्म किये जाते हैं। यह वह स्थान है जहां गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए पाण्डवों ने यज्ञ किया था। शिला से नीचे भागीरथी की जलधरा में एक कुण्ड सा बन गया है जिसको ब्रह्मकुण्ड कहते है। ब्रह्मकुण्ड के पीछे की ओर भागीरथी की धरा रूकने से बने कुण्ड को विष्णु कुण्ड के नाम से सम्बोधित किया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार इस कुण्ड में भगवान विष्णु निवास करते हैं। मंदिर से कुछ दूरी पर जहां झरने के रूप मे गंगा नीचे गिरती है वह स्थान गौरी कुण्ड कहलाता है।

लोक आस्थाओं के अनुसार पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए इस स्थान पर तपस्या की थी। गंगा मंदिर के पीछे बनी समाधि के विषय में भी यह प्रसिद्ध है कि आदिगुरू शंकराचार्य का निर्वाण यहीं हुआ था। गंगोत्री के निकट ही यहां के रक्षक का मंदिर है। भैरव देवता गंगोत्री के रक्षक हैं। ऐसी मान्यता है कि भैरव की पूजा किये बिना गंगोत्री की तीर्थ यात्रा का फल नहीं मिलता।

गंगोत्री के निकट ही गंगनानी नाम का स्थान है जहां गर्म जल के कुण्ड में स्नान किया जाता है। मान्यता है कि गंगोत्री धाम की यात्रा करने वाले सभी यात्रियों को इस कुण्ड में जरुर स्नान करना चाहिए।

गंगोत्री मंदिर की तरह ही इस छोटे से शहर की कहानी भी बहुत रोचक है। प्राचीन काल में यहां मंदिर नही था। भागीरथी शिला के निकट एक मंच हुआ करता था जहां यात्रा मौसम के तीन चार महीनों के लिए देवी देवताओं की मूर्ति रखी जाती थी। इन मूर्तियों को गांव के विभिन्न मंदिरों जैसे श्याम प्रयाग, गंगा प्रयाग, धराली और मुखबा आदि गांवों से लाया जाता था और फिर बाद में यात्रा मौसम समाप्त होने पर उन्ही गांवों में लौटा दिया जाता था।

मनुष्य के सभी पापों को हरने वाली मां गंगा की महिमा अपरंपार है। तो फिर देर किस बात की चले आईए गंगोत्री धाम…मां गंगा आपके कष्टों को हरने के साथ ही आपकी हर मुराद जरुर पूरी करेगी।

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