उत्तराखंड की रक्षक देवी | दिन के दौरान अपना रूप बदलती है ये देवी

देहरादून (उत्तराखंड पोस्ट ब्यूरो) माता धारी देवी को उत्तराखंड की रक्षक देवी के रूप में जाना जाता है। देवी का यह पवित्र मंदिर बद्रीनाथ रोड पर श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के बीच अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है । धारी देवी की मूर्ति का ऊपरी आधा भाग अलकनंदा नदी में बहकर यहां आया था तब से मूर्ति यही पर है । तब से यहां देवी “धारी” के रूप में मूर्ति पूजा की जाती है । मूर्ति की निचला आधा हिस्सा कालीमठ में स्थित है, जहां माता काली के रूप में आराधना की जाती है |

मंदिर में स्थित पुजारियों के अनुसार एक रात जब भारी बारिश के चलते नदी में जल बहाव तेज था । धारी गाँव के समीप एक स्त्री की बहुत तेज ध्वनि सुनाई दी , जिससे गाँव के लोग डर गए , कि किसी स्त्री के साथ कोई अनहोनी ना हो गयी हो । जब गाँव के लोगों ने उस स्थान के समीप जाकर देखा तो वहाँ गाँव के लोगों को पानी में तैरती हुई एक मूर्ति दिखाई दी । किसी तरह ग्रामीणों ने पानी से वो मूर्ति निकाली और मूर्ति निकालने के बाद कुछ ही पल में देवी आवाज ने उन्हें मूर्ति उसी स्थान पर स्थापित करने के आदेश दिये , तब से धारी गाँव के लोगों ने इस स्थल को धारी देवी का नाम दिया।

देवी दिन के दौरान अपना रूप बदलती है । स्थानीय लोगों के मुताबिक, कभी एक लड़की, एक औरत, औरइ फिर एक बूढ़ी औरत का रूप बदलती है । मंदिर में माँ धारी की पूजा-अर्चना धारी गाँव के पंडितों द्वारा किया जाता है। यहाँ के तीन भाई पंडितों द्वारा चार-चार माह पूजा अर्चना की जाती है । मंदिर में स्थित प्रतिमाएँ साक्षात व जाग्रत के साथ ही पौराणिककाल से ही विधमान है ।

धारी देवी को चार धामों के रक्षक के रूप में सम्मानित किया गया है | जब देवी की मूर्ति को उसके स्थान से हटा दिया गया तो कुछ ही घंटो बाद उस क्षेत्र में बहत बड़ा बादल फटा | श्रद्धालुओं के अनुसार इस क्षेत्र को देवी के क्रोध का सामना करना पड़ा क्यूंकि देवी को 330 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना के लिए रास्ता बनाने के लिए उनके मूल स्थान से स्थानांतरित किया गया था |एक स्थानीय राजा ने भी 1882 में धारी देवी को मूल स्थान से हटाने की कोशिश की थी , तब भी केदारनाथ में भूस्खलन हुआ था |

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