अखरोट | उत्तराखण्ड में वैज्ञानिक रूप से व्यवस्थित खेती की जरुरत: डॉ डोभाल

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देहरादून (उत्तराखंड पोस्ट ब्यूरो)  अखरोट उत्तराखण्ड का एक महत्वपूर्ण फल है जो कि केवल मुख्यतः पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता हैं। अखरोट में मौजूद ओमेगा-3 व 6 फैटी अम्ल एवं 60 प्रतिशत तेल की मात्रा होने की वजह से यह पोष्टिक, औषधीय एवं औद्योगिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह रक्त में कोलेस्ट्रोल का स्तर कम करने के साथ-साथ रक्त वाहनियों की क्रियाओं के सुचारू संचालन तथा मैमोरी बढ़ाने में भी सहायक होता है।

वैज्ञानिक तौर पर यह juglandaceae परिवार से सम्बन्ध रखता है तथा हिमालयी राज्यों में 900 से 3000 मीटर तक की ऊँचाई तक पाया जाता है। विश्व भर में Juglans जीनस अन्तर्गत लगभग 21 प्रजातियां पायी जाती हैं जिसमें पारसियन अखरोट सबसे ज्यादा व्यवसायिक रूप से उगायी जाती है। पारम्परिक रूप से अखरोट के पौधे के विभिन्न भागों को पारम्परिक रूप से कीटनाशक तथा औषधीय के रूप में प्रयोग किया जाता है जैसे क्रीमी, अतिसार, उदर रोग, अस्थमा, त्वचा रोग तथा थायराईड विकार निवारण के लिय भी प्रयुक्त किया जाता है। यद्यपि अखरोट का उद्भव एशिया से माना जाता है परन्तु विश्व में मुख्य रूप से भारत, मेक्सिको, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, यूक्रेन, इटली, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, श्रीलंका, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान तथा अरमेनिया में भी इसकी खेती की जाती है। इन देशों में अखरोट की बहुत ज्यादा अनुवांशिक विविधता पायी जाती है।

भारत में अखरोट की खेती किसी भी हिमालयी राज्य में व्यवसायिक रूप से तो नहीं की जाती है, ना ही व्यवस्थित रूप से कहीं अखरोट के बागान देखने को मिलते हैं। केवल जम्मू कश्मीर का भारत के कुल अखरोट उत्पादन में 90 प्रतिशत का योगदान है जो कि 2.69 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर जो 83,613 भूमि पर इसका उत्पादन किया जाता है। जबकि उत्तरी पश्चिमी हिमालय के अन्य राज्य सिक्किम, हिमाचल, अरूणाचल, दार्जिलिंग तथा उत्तराखण्ड में भी अखरोट का पारम्परिक उत्पादन किया जाता रहा है।

भारत में प्रमुख रूप से काठी अखरोट (hard shelled), मध्य काठी (medium hard shelled) तथा कागजी अखरोट (paper shelled) मुख्यतः पाये जाते हैं। जहाँ तक भारत में उगाये जाने वाली अखरोट की प्रजातियों की बात की जाय तो जम्मू कश्मीर में drainovsky, opex caulchry, हिमाचल में विल्सन, गोविन्द, यूरेका तथा उत्तराखण्ड में चकराता सलेक्शन का उगाया जाना साहित्य में वर्णित है।

जहां तक अखरोट की वैज्ञानिक विश्लेषण की बात की जाय तो विश्व में मुख्यतः दो ही प्रजातियां पायी जाती हैं, एक पारसियन अखरोट (Juglans regia) तथा दूसरा काला अखरोट (Juglans nigra)। पारसियन अखरोट का उद्भव पर्सिया से माना जाता है जबकि काला अखरोट का उद्भव पूर्वी उत्तरी अमेरिका से माना जाता है। काला अखरोट स्वाद में तो पारसियन अखरोट से बेहतर पाया जाता है परन्तु कठोर सेल होने की वजह से व्यवसायिक रूप नहीं ले पाया जबकि एक अन्य प्रजाति Juglans californica रूट स्टॉक के लिये प्रयोग की जाती है।

19 दिसम्बर, 2008 इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख के अनुसार प्रदेश में अखरोट के व्यवसायिक उत्पादन के लिये उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रदेश की भौगोलिक स्थिति, जलवायु की महत्ता को देखते हुये प्रदेश सरकार द्वारा अखरोट उत्पादन पर बल दिया है जो कि प्रदेश के राजस्व प्राप्ति में प्रमुख भूमिका निभा सकता है। यद्यपि उत्तराखण्ड में लगभग 10,000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में अखरोट का उत्पादन होता है परन्तु यह व्यवसायिक तरीके से उत्पादित नहीं किया जाता है। जबकि केवल जम्मू कष्मीर में अखरोट के व्यवसाय से ही 200 करोड़ का राजस्व प्राप्त होता है। इसी के मध्यनजर उत्तराखण्ड सरकार द्वारा ततवर्ष अखरोट के 4500 पौधे फ्रांस से आयात किये गये ताकि इस महत्वपूर्ण फल को उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में एक व्यवसाय का रूप दिया जा सके। 20 जनवरी, 2015, पी0टी0आई0, देहरादून के अनुसार उत्तराखण्ड में अखरोट के व्यवसायिक उत्पादन हेतु मदर नर्सरी की स्थापना की गयी तथा नेशनल हॉर्टीकल्चर टैक्नोलॉजी मिशन ओसिओन के तहत पंचायत स्तर पर इसके व्यवसायिक उत्पादन पर जोर दिया गया।

वर्ष 2013 तक विश्व स्तर पर अखरोट का उत्पादन 3.458 मिलियन टन रहा जिसमें चीन का 49 प्रतिशत का योगदान है। संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व में सर्वाधिक अखरोट निर्यातक देश है जिसमें 0.420 मिलिटन टन उत्पादन तथा टर्की 0.21 मिलियन टन के साथ द्वितीय स्थान पर है।

वैज्ञानिक विश्लेषणों के अनुसार अखरोट में ओमेगा – 3 व 6 होने की वजह से बेहतर एंटीऑक्सीडेंट क्षमता के साथ रक्त में कालेस्ट्रोल का स्तर कम करने के साथ-साथ इन्फ्लामेशन को भी कम करता है। ओमेगा – 3 व 6 फैटी अम्ल के अलावा इसमें लिनोलेइक, पालमेटिक, स्टेरिक तथा मेलोटोनीन एंटीऑक्सीडेंट भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो कि निद्रा रोग निवारण में काफी सहायक होता है। इसी महत्वपूर्ण पोष्टिक एवं औषधीय गुणों की वजह से एफ0ए0ओ0 द्वारा अखरोट को महत्वपूर्ण पौधों की सूची में सम्मिलित किया है। फूड ड्रग एडमिनिसट्रेशन के अनुसार यदि अखरोट को खाद्य कड़ी में सम्मिलित किया जाय तो यह हृदय विकार को काफी हद तक कम कर देता है।

पौष्टिकता की दृष्टि से भी अखरोट अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसमें प्रोटीन 6.7, वसा 65.21, कार्बोहाइड्रेट 13.71 ग्राम प्रति 100 ग्राम तथा विटामिन ए 20 आई0यू0 प्रति 100 ग्राम, विटामिन सी 1.3, थियामिन 0.34, विटामिन बी6 0.537, कैल्षियम 0.98, लौह 2.91, सोडियम 20.0, मैग्नीशियम 158, मैग्नीज 3.414, पोटेशियम 441, फास्फोरस 346 तथा जिंक 3.09 मिग्रा0 प्रति 100 ग्राम तक पाये जाते हैं। इसके साथ-साथ फार्मास्यूटिकल तथा सौन्दर्य प्रसाधन उद्योगों में भी अखरोट के विभिन्न भागों की बहुतायत मांग रहती है।

भारत द्वारा वर्ष 2013-14 में 6726.36 मीट्रिक टन का अखरोट निर्यात किया गया जिससे लगभग 324.53 करोड़ का आर्थिक उपार्जन किया गया। एक परिपक्व पेड़ से लगभग 40 से 50 किलोग्राम तक अखरोट प्राप्त किये जा सकते हैं। उत्तराखण्ड प्रदेश की भौगोलिक स्थिति, जलवायु को दृष्टिगत रखते हुये यदि इसकी वैज्ञानिक रूप से व्यवस्थित खेती की जाय तो यह प्रदेश के राजस्व उपार्जन में सहायक सिद्ध हो सकता है।

(Source: डा. राजेन्द्र डोभाल के फेसबुक से साभार, डॉ डोभाल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् देहरादून में महानिदेशक हैं।)

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