उत्तराखंड के पंचप्रयाग : जहां स्नान करने से धुल जाते हैं सारे पाप

देहरादून [उत्तराखंड पोस्ट ब्यूरो] प्रयाग का अर्थ है नदियों का संगम। भारत में कुल 14 संगम या यूं कहें प्रयाग स्थित है। इनमें से 5 प्रयाग अकेले उत्तराखंड में हैं। इन्हें पंच प्रयाग के नाम से जाना जाता है। देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, नन्दप्रयाग और विष्णुप्रयाग के नाम से मशहूर ये सभी प्रयाग उत्तराखंड में मुख्य नदियों के संगम पर स्थित हैं।

देवप्रयाग | ऋषिकेश से 70 किलोमीटर दूर यह पहला प्रयाग है । रामायण और केदारखंड में उल्लेख मिलता है कि रावण का वध करने के बाद ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भगवान राम, लक्ष्मण और सीता यहां तपस्या करने आये थे। इस स्थान पर भागीरथी और अलकनंदा का संगम होता है। दोनों नदियों की धाराएं मिलकर गंगा कहलाती हैं। माना जाता है कि यहां पर स्नान करने से इलाहाबाद के प्रयाग स्नान का फल मिलता है।

 

रुद्रप्रयाग | मन्दाकिनी तथा अलकनंदा नदियों के संगम पर रुद्रप्रयाग स्थित है। माना जाता है कि यहीं पर ब्रह्माजी की आज्ञा से देवर्षि नारद ने हजारों वर्ष तपस्या की थी।

 

कर्णप्रयाग | अलकनंदा तथा पिण्डर नदियों के संगम पर कर्णप्रयाग स्थित है। संगम से पश्चिम की ओर शिलाखंड के रुप में दानवीर कर्ण की तपस्थली और मन्दिर हैं। यहीं पर महादानी कर्ण द्वारा भगवान सूर्य की आराधना और अभेद्य कवच कुंडलों का प्राप्त किया जाना प्रसिद्ध है। कर्ण की तपस्थली होने के कारण ही इस स्थान का नाम कर्णप्रयाग पड़ा।

 

नन्दप्रयाग | नन्दाकिनी तथा अलकनंदा नदियों के संगम पर नन्दप्रयाग स्थित है। कर्णप्रयाग से उत्तर में बदरीनाथ मार्ग पर 21 किमी आगे नंदाकिनी एवं अलकनंदा का पावन संगम है। पौराणिक कथा के अनुसार यहां पर नंद महाराज ने भगवान नारायण की प्रसन्नता और उन्हें पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए तप किया था। नन्दा का मंदिर, नंद की तपस्थली एवं नंदाकिनी का संगम आदि योगों से इस स्थान का नाम नंदप्रयाग पड़ा।

 

विष्णुप्रयाग | धौली गंगा तथा अलकनंदा नदियों के संगम पर विष्णुप्रयाग स्थित है। यहां पर अलकनंदा तथा विष्णुगंगा (धौली गंगा) का संगम स्थल है। स्कंदपुराण में इस तीर्थ का वर्णन विस्तार से आया है।

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