करवा चौथ विशेष | जानिए कौन थी करवा, क्या है उसकी कहानी ?

देहरादून [अमित तिवारी] पति की लंबी आयु के लिए हिंदू धर्म में महिलाएं करवाचौथ का व्रत रखती हैं। इस दिन महिलाएं पूरे दिन बिना कुछ खाए पिए निर्जला व्रत रहती हैं। सुबह सूर्योदय होने के साथ ही पूजा-पाठ की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जो रात को चंद्र दर्शन के साथ समाप्त होती हैं।

इसके अलावा इस व्रत के विधान में करवाचौथ की कहानी का भी खास योगदान होता है। महिलाएं 16 श्रंगार कर इस व्रत की कथा पढ़कर सुनाती हैं, तब जाकर ये व्रत पूरा माना जाता है।

करवा चौथ की कहानी | करवा चौथ व्रत कथा प्राचीन समय की बात है। एक साहूकार के सात बेटे थे और एक बहन जिसका नाम करवा था। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। एक दिन की बात है करवा अपने ससुराल से मायके आयी हुयी थी। शाम के वक्त जब सभी भाई अपना व्यवसाय बन्द करके घर वापस हुये तो भोजन करने के लिए अपनी बहन को भी साथ में बैठने का आग्रह किया। लेकिन बहन ने बताया कि आज उसका करवा चौथ का निर्जला व्रत है। इसलिए आज वह चन्द्रमा को अघ्र्य देकर ही भोजन ग्रहण करेगी।

चन्द्रमा अभी अदृश्य था इसलिए करवा भूख, प्यास से व्याकुल थी। यह देखकर सबसे छोटे भाई से रहा नहीं गया वह दूर जाकर एक पीपल के पेड़ पर दीपक जलाकर उसकी ओट में चलनी रख दी जिससे वह चन्द्रमा जैसा प्रतीत होने लगा। तत्पश्चात भाई ने अपनी बहन करवा को आकर बताया देखो चांद उदित हो गया है। यह सुनकर करवा नंगे पैर दौड़कर छत पर चढ़ गई और चांद को देखकर खुशी से झूम उठी। फिर उसने पूरे विधि-विधान से चन्द्र को अघ्र्य देकर पूजन किया और जैसे ही भोजन का पहला कौर खाया तुरन्त छींक आ गई, दूसरा कौर ग्रहण करने पर भोजन में बाल निकलता है और तीसरे कौर को मुख में डालने से पहले उसके पति की मृत्यु का समाचार मिलता है। यह खबर सुनते ही करवा हाल-बेहाल हो जाती है। पति की मृत्यु क्यों हुयी ?

करवा के पति की मृत्यु क्यों हुयी इस बात से उसकी भाभी अवगत कराती है कि करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता नाराज हो गये है। सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि अपने पति की मृत्यु का वह अन्तिम संस्कार नहीं करेगी बल्कि अपने सतीत्व के बल पर पति को पुनः जीवित कराकर रहेगी। वह पूरे एक वर्ष तक अपने पति के शव के पास बैठकर उसकी देखभाल करती रही एंव उसके ऊपर उगने वाली सुईनुमा घास को एकत्रित करती रही है। पुनः करवा चौथ का व्रत आता है एक वर्ष बाद पुनः करवा चौथ का व्रत आता है। उसकी सभी भाभियां करवा चैथ का व्रत रखती है जब भाभियां उससे आशीर्वाद लेने आती है तो वह प्रत्येक भाभी से कहती है कि यम सुई ले लो और पिय सुई दे दो और मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो। सभी भाभियों से वह यही आग्रह करती है किन्तु हर भाभी टाल देती है। जब छठें नम्बर की भाभी आती है तो वह बताती है कि सबसे छोटे भाई की वजह से तुम्हारा व्रत टूटा है इसलिए सबसे छोटी भाभी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को जिंदा कर सकती है। इसलिए जब सबसे छोटी भाभी आये तो उसका हाथ पकड़ लेना और उसका हाथ तब-तक न छोड़ना जब-तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न करा दे। सबसे अन्त में छोटी भाभी आयी तो उससे भी करवा सुहागिन बनने का आग्रह करने लगी। वह भी टालमटोल करती है किन्तु करवा उसका कसकर हाथ पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए गिड़गिड़ती व मिन्नतें करती है। काफी प्रयास के बाद उसकी भाभी का दिल पसीज जाता है और अपनी छोटी अंगुली को चीरकर अमृत उसके मृत पति के मुख में डाल देती है जिससे करवा का पति जीवित हो जाता है। गणेश भगवान जी की कृपा से करवा का सुहाग वापिस आ जाता है।

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