उत्तराखंड से दूर असम में कांग्रेस को मजबूत कर रहे हैं हरीश रावत, पढ़िए उनका ‘गमछा’ पोस्ट

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नई दिल्ली (उत्तराखंड पोस्ट)  उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत वर्तमान में कांग्रेस महासचिव हैं और कांग्रेस के असम राज्य के प्रभारी हैं। इन दिनों उत्तराखंड में निकाय चुनाव का जोर है लेकिन असम राज्य की कमान मिलने के बाद से हरीश रावत का ज्यादातर वक्त असम में कांग्रेस को मजबूत बनाने में ही बीत रहा है।

अपने असम प्रवास के दौरान हरीश रावत असम की संस्कृति से अपने फेसबुक पेज से जुड़े लोगों को रबरु करा रहे हैं। हरीश रावत ने ‘गमछा’ शीर्षक से असम की संस्कृति के विभिन्न रंगों को लोगों के सामने प्रस्तुत करने की कोशिश की है। आप भी पढ़िए हरीश रावत पूरा लेख- 

हरीश रावत लिखते हैं- जिस रोज राहुल जी ने मुझे असम प्रदेश का प्रभार सौंपा, मैं गमछा वाला हो गया हॅू। गमसा या गमछा असम की अपनी विशेषता है। यह एक, हाथ से बुना हुआ अंग वस्त्र है। असम में सम्मान स्वरूप नर-नारी दोनों गमछा प्रदान करते हैं। बहुत सुंदर प्यारा-2 अंग वस्त्र है, असमी गमछा। हजारों लोग कुटीर उद्योग के तौर पर गमछा बनाते हैं। गमछा असम में गेंडे(रोहिनों), सराय व जापी (असमियां टोप) की तरह अतिसम्मानित प्यार भरा सम्मान माना जाता है। मुझे मेरे आसाम के कांग्रेस के भाई-बहन, इतने प्यार भरे गमछे दे रहे हैं, मैं गमछा बाबा बन गया हॅूं। हमारे देश में अंगवस्त्र व सम्मान फूल-माला का चलन बड़ा पुराना है।

रावत आगे लिखते हैं कि दक्षिण भारत के अंगवस्त्र बड़े गहरे रंग के, बहुत-2 महंगे होते हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश में तिरंगी सूती माला का चलन है। कुछ राज्यों में शॉल व हिमाचल में टोपी, नागालैण्ड में रंगीन वास्कट, मिजोरम में बांस का टोप या कैप। सबके अपने-2 तरीके हैं, सम्मान व्यक्त करने के। असम का गमछा भी टी-गार्डन एरिया में हरा, पीला रंग लिये होता है। कार्विलोंग का गमछा (पोहो) बड़ा रंगीन लाल-2 होता है। बोरो का गमछा आपनाई कहलाता है। यह भी रंगीन होता है। तिवा जनजाती का गमछा भी बोरों की तरह नांरगी-पीला होता है।

मिशिंग जनजाती का गमछा रिवी कहलाता है, यह लाल रंग का होता है। मगर गमछा नामकरण सामान्य संबोधन है। है न बड़ा रंगीन, विभिन्नतापूर्ण असम, सर्वकालिक महान कवि, संगीतकार, लोक संगीत के सितारे भूपेन हजारिया की जन्म भूमि असम। भारतीय संस्कृति का सबसे विविधतापूर्ण राज्य आसाम, तुम्हें धन्य हैं। भारत को समझने के लिये असम को समझना आवश्यक है। मैं सोचता हॅू, जब नागालैण्ड, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, मेघालय, अरूणांचल, असम का भाग रहे होंगे, तो कितना जटिल रहा होगा, इस राज्य का सांस्कृतिक भूगोल। इसलिये एक के बाद एक, नया राज्य अस्तित्व में आया और सिक्किम को मिलाकर माॅ कामाख्या का अष्टभुजाधारी स्वरूप हमारे सामने है।

महाभारत-कालीन प्रागज्योतिषपुर भी यही असम है। यहां के राजा भगदत्त व उनके विशाल हाथी व हाथियों की सेना का उल्लेख महाभारत में आता है, अपने हाथियों के साथ भगदत्त लगभग अजेय थे। असम को गैंडों के बाद, अपने हाथियों पर भी गर्व है। ऐतिहासिक कामरूप प्रदेश भी यही है। शोणितपुर भी यही है। शोणितपुर के राजा वाणासुर की पुत्री ऊषा, अपने स्वप्न प्रेमी कृष्ण पुत्र अनिरूद्ध का अपहरण कर यही शोणितपुर के किले में लायी थी। ऐसा उल्लेख महाभारत-कालीन कथाओं में आता है। चम्पावत जिले के कर्ण-करायत में स्थित वाणासुर का किला भी शोणितपुर के बड़े टीले के आकार का है। बड़ा साम्य है, दोनों स्थानों की दंत कथा में। दोनों के नायक-नायिका भी एक ही हैं। यह शोध का विषय है, वास्तविक किला कौन सा है। मगर महाभारत कालीन इतिहास के पुरूषों का गम्भीर संबन्ध असम से रहा है। यह उपरोक्त महाभारत-कालीन स्थलों के नामों से स्पष्ट हो जाता है।

अर्जुन अपने भ्रमण के दौरान मणिपुर पधारते हैं और उनका विवाह वहां की राजपुत्री चित्रांगदा से होता है। चित्रांगदा से उत्पन्न अर्जुन पुत्र विभ्रुवाहन, अर्जुन के अश्वमेघ घोड़े को पकड़ लेता है। अर्जुन विभ्रुवाहन को युद्ध के लिये ललकारते हैं और युद्ध में पराजित हो जाते हैं। अचेत अर्जुन को चित्रांगदा अर्जुन की एक और पत्नी उलूपी की सहायता से होश में लाती हैं। इन दंत कथाओं से तत्कालीन असमियां इतिहास का कुछ आभास होता है।

मध्यकालीन असम के नायक लासित बड़ फूकन हैं। उनका एक बड़ा सा स्टैच्यू ब्रहमपुत्र के मध्य स्थापित है। यह वही स्थल है जहां लासित ने रूग्ण होते हुये भी मुगल सेनाओं का मुकाबला किया था। उन्हें इस स्थल पर निर्णायक विजय हासिल हुई थी। सोलह बार मुगलों को पराजित करने वाला यह हीरो, अहोम राजवंश का सेनापति था। लासित की विजय में जिस व्यक्ति ने निर्णायक सहयोग दिया था, उसका नाम इस्माईल सिद्धिकी था। अहोम राजा ने, उसकी ताकत व बहादुरी से प्रभावित होकर, बाघ हजारिका का खिताब दिया था। असम में बोरा दस सैनिकों, सैकिया सौ सैनिकों तथा हजारिका हजार सैनिकों का कमाण्डर होते थे। यही उपाधियां कालान्तर में सरनेम में बदल गई हैं। शेराघाट के निर्णायक युद्ध में, अपने सौर्य के बल पर इस्माईल ने, अहोम राजा से बाघ (अर्थात शेर) का संबोधन प्राप्त किया। असम की जनता लासित बड़ फूकन के साथ बाघ हजारिका अर्थात इस्माईल सिद्धिकी को भी अपना असमियां नायक मानती हैं।

असम की इतिहास को कई लोगों ने प्रभावित किया। अहोम राज्य को चीनी राजवंश के चाउलूंगसीउ काफा ने, पूर्वी असम पर अधिकार कर स्थापित किया। अहोम वंश का शासन 1829 तक बना रहा। अंग्रेज ही अहोम को पराजित कर पाये। मुगल शासक लाख प्रयासों के बावजूद भी अहोम वंश को पराजित नहीं कर पाये थे। अहोम से पहले भाष्कर वर्मन, साल्श्ताम्भस, कामरूप पाल, पुष्प वर्मन आदि ने, असम पर राज किया। अहोम राजवंश का उत्तरी असम में शासन, अंग्रेजों, अर्थात ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रभुत्व स्थापित होने तक बना रहा। अहोम राजवंश बहुत ही उदार, गुण फारखी व सभी जाति धर्मों को सम्भाव से देखने वाला रहा है। शायद इसलिये मुगल भी इस राजवंश को पराजित नहीं कर पाये। असम के मुसलमान अहोम राजवंश का उतना ही सम्मान करते हैं, जितना हिन्दू असमवासी। अद्भूत हैं आसाम की संस्कृति व परम्पराएं। मैं भी धीरे-2 अध्ययन कर रहा हॅू। कामरूप जिले में हाजो स्थान में अलग-2 पहाड़ियों में मस्जिद/दरगाह तथा भगवान विष्णु जी का मंदिर व बोध तीर्थ बना हुआ है। यह स्थान भारतीय धर्मों की त्रिवेणी है। यहां हयग्रिवा, माधव मंदिर मोनीकुट पर्वत (छोटा सा ऊंचा स्थान) पर स्थित है। सन 1583 में राजा रघुदेवा नारायण द्वारा बनाया गया यह मन्दिर भगवान विष्णु के नरसिंग अवतार का है। उसी रूप में भगवान विष्णु यहाँ पूजे जाते हैं। यह मंदिर हाथियों के चित्रों के साथ असम की कलात्मकता का नमूना है। इसके एक भाग में बौद्ध पूजा स्थल है, मान्यता है भगवान बुद्ध ने यहां निर्वाण प्राप्त किया था। यहां की एक पहाड़ी गरूरचाला पर पोआ मक्का मस्जिद है।

कहा जाता है एक धर्म प्रचारक ने मक्का की मिट्टी लाकर इसे बनाया। 12वीं सदी में गयासउद्दीन ओलिया ने इसका निर्माण कराया। उनकी दरगाह भी यहीं है। कहा जाता है यहा सजदा करने से मक्का यात्रा का पुण्य मिलता है। मुझे इन दोनों पवित्र स्थानों में जाने का सौभाग्य मिला है। गुवाहाटी आप आयें और माॅ कामाख्या के दर्शन का लाभ न ले, कैसे हो सकता है। मुझे यह सौभाग्य कई बार प्राप्त हुआ है। गोहाटी शहर के मध्य भाग में, निलांचल पर्वत पर माॅं कामाख्या विराजमान हैं। यह एक शक्तिपीठ है। यहा माॅं अपने कई रूपों सहित शक्ति रूप में, मुख्य मन्दिर में विराजमान है। यह देश के दो तांत्रिक पीठों में एक है। दूसरी पीठ दतिया (मध्य प्रदेश) में है। आठवीं सदी से सतरवीं सदी तक इस मंदिर में कई प्रकार के स्कल्पचरल बदलाव व जुड़ाव आये हैं। कहा जाता है, अलग-2 समय पर अलग-2 शैलियों ने इस मंदिर के ढ़ाॅचे पर अपना प्रभाव छोड़ा है। कुल मिलाकर आज इसे निलांचल शैली कहा जा सकता है। यह भव्यत्म विशाल मंदिर समूह परिसर है। इस परिसर में माॅ तारा, मातंगी, काली, शोडषी, भैरवी आदि के भी मंदिर हैं। उत्तर गोहाटी में पीकोक टापू में भगवान शिव का प्रसिद्ध मंदिर है। यहाँ बोट से जाया जाता है। मंदिर का नाम उमानन्द है।

जब मंदिरों का जिक्र चल पड़ा है, मैं असम के एक और सामाजिक समरसता के मंदिर का जरूर उल्लेख करूंगा। शिवसागर जिले में शिवडोला मंदिर अद्भूत है। डोला मुसलमानों द्वारा निर्मित इस मंदिर में शिवभोग का आधा हिस्सा डोला मुसलमान बनाते हैं। सारा शिवसागर अपनी इस परम्परा पर गर्व करता है।

आज का आसाम 33 जिलों का प्रान्त है। जिसमें मजूली सबसे छोटा व कनिष्ट जिला है। इस राज्य की संस्कृति, इतिहास, परम्पराओं, जातियों व सामाजिक पररम्पराओं को समझना, चारों वेदों के पाठन जैसा क्लिष्ट है। यहां के मूल निवासियों से लेकर, अहोम वंश व मेमनपुर से आकर यहां बसे हुये मुसलमानों का, एक बड़ा इतिहास है। चाय बागानों में झारखण्ड के संथाल क्षेत्र से आये हुये लोगों सहित, नेपाली मूल के भाई-बहनों ने इस राज्य की सामाजिक व्यवस्था को बहुत ही दिलचस्प बना दिया है। राज्य की मुख्य भाषा असमियां व बंगाली है। मगर बोरो, नेपाली, संथाली, कर्वी आदि भाषा बोलने वाले बड़ी संख्या में हैं। असमी गमछों के रंग भी भाषा के साथ बदलते हैं। यदि नहीं बदलती है तो, असम की रंगिनियत। असमी बिहू, दुर्गा पूजा, काली पूजा, संथाल बिहू जिसे नौखोवा कहा जाता है, असम को दुनियां की नजर में एक अलग पहचान देते हैं। अहोम लोग, मेडम मेथी, बोरो लोगों का बोथो पूजा, मिसिंग लोगों का अलीआईलिगांग सहित उपरोक्त त्योहारों पर फिर कभी लिखूंगा।

मैं इस लेख में भूपेन हजारिका के विषय में, जिनका अभी 8 सितम्बर को सारे आसाम में जन्मदिन मनाया गया, लिखे बिना नहीं रह पा रहा हॅू। रूदाली प्रसिद्ध भूपेन हजारिका पद्म भूषण भूपेन दा, दादा साहब फाल्के पुरूस्कार विजेता भूपेन दा, असम रत्न भूपेन दा, असम राज्य के सर्वप्रिय व्यक्तित्व हैं। गुवाहाटी विश्वविद्यालय में स्थापित उनका स्मारक भी उनके व्यक्तित्व की ऊंचाई की सही अभिव्यक्ति नहीं दे सकता है। सभी के दिलों में राज करने वाले भूपेन हजारिका कंठसुधा थे। अमृत है उनके स्वरों में। एक लेखक, कवि, पाश्र्व गायक, संगीतकार, फिल्म निर्माता भूपेन दा के कंठ ने हमेशा मानवता व विश्व बन्धुत्व को स्वर दिया। उन्होंने एक बार भा0ज0पा0 से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा। इस घटना को उन्होंने अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल बताया। दल व राजनीति छोड़ दी। आखिर सामाजिक सौहार्द, साम्प्रदायिक सद्भाव, उच्च मानवीय संवेदनाओं का चितेरा, कैसे ऐसे पिंजरे में रह सकता था, जो उनके लिये एक दम अजनवी था। भूपेन दा ने असम व नार्थ ईस्ट के फोक कल्चर, फोक डान्सेज व गीतों को भारतीय सिनेमा का हिस्सा बनाया। उनकी सभी प्रस्तुतियों में इसीलिये एक नयापन छलकता है। साहित्य, नाट्य तथा फिल्म जगत का कोई भी सम्मान उनसे दूर नहीं रहा। हजारिका भारतीय संगीत नाटक एकेडमी के चेयरमैन भी रहे। मैंने कुछ बातों को ही उनके विषय में जाना है। असम को समझने जैसा ही दुरूह है डाॅ0 भूपेन हजारिका को समझना। आप उनका एक छोर भी समझ लें तो धन्य मानिये। असमी, बंगाली, हिन्दी, अंग्रेजी सभी भाषाओं में उनके गीत गुन-गुनाते आपको हजारों लोग मिल जायेंगे। मैं 8 सितम्बर के दिन भारत बंद की तैयारी के लिये असम गया था। संयोगवश मेरे असम पहुचने का दिन, भूपेन दा का जन्मदिन था। मेरे पांव बरबस उनके स्मारक की ओर बढ़ गये। सारा वातावरण भूपेन दा के गीतों से गुंजायमान था। मेरा मन भी अपने को रोक नहीं पाया। कब गाड़ी में बैठकर होटल की ओर चलते हुये मैंने प्रसिद्ध फिल्म रूदाली के उनके गीत को गुन-गुनाना शुरू किया, मुझे खुद मालूम नहीं।

‘‘दिल हूम-हूम करे, घबराये

धन-धम धम करे, डर जाये

एक बूंद कभी पानी की

मोरी अंखियों से बरसाये

तेरी छोरी डारूं सब सूखे पात हो जाये,

तेरा छुवा लागे, मेरी सूखी डाल हरियाये,

दिल हूम-हूम करे……………..’’।

आज गुवाहाटी से आते वक्त मैं उस क्षण को स्मरण कर रहा हॅू, जब मैंने उनके स्टैच्यू के पास अंसख्य भावना पुष्पों के साथ, गमछा पहनाया। शायद मैं, उन्हें, असम के धरती पुत्र को, इससे और बेहतर कुछ भेंट नहीं कर सकता था। धन्य हैं असम। धन्य है गमछा।

(हरीश रावत)

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