पार्ट- 2 | अलग उत्तराखंड राज्य के समर्थन में क्यों नहीं थे हरीश रावत ? खुद किया बड़ा खुलासा

राजनीति में संयोग का बड़ा महत्व होता है। समय व मेरी मां की तपस्या ने मुझे इन्दिरा जी का आशीर्वाद प्राप्त करवाया। मैं अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र से 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का उम्मीदवार घोषित हो गया। स्व. संजय गांधी जी का सानिध्य व लखनऊ विश्व विद्यालय के दोस्तों का इसमें बहुत बड़ा योगदान रहा। संयोग देखिये मुझे देश के दो महान उदभट्ट विद्धानों से चुनाव लड़ना पड़ा।
 
Harish
 

पार्ट- 1 | अलग उत्तराखंड राज्य के समर्थन में क्यों नहीं थे हरीश रावत ? खुद किया बड़ा खुलासा

देहरादून (उत्तराखंड पोस्ट) उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को अलग उत्तराखंड राज्य का विरोधी कहा जाता रहा है। अब हरीश रावत ने इस पर खुलकर बात की है। हरीश रावत ने इस पर अपने फेसबुक पेज पर बकायदा एक लंबा पोस्ट लिखा है और अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है।

हालांकि हरीश रावत का ये दूसरा पोस्ट और इस पर वे आगे भी लिखेंगे क्योंकि उन्होंने अपनी बात क्रमश: के साथ खत्म की है। पार्ट- 1 आप ऊपर दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

नीचे पढ़िए हरीश रावत का फेसबुक पोस्ट पार्ट- 2 का मूल पाठ- 

ब्लॉक प्रमुख के रूप में मुझे जहां भी सरकारी गोष्ठियों में आमंत्रित किया गया, वहां मैंने क्षेत्रीय सवालों को समझने का प्रयास किया। उस समय ब्लॉक प्रमुख, कई जिला स्तरीय व मण्डलीय समितियों के सदस्य होते थे। मेरे लिये ये बैठकें, एक शिक्षण कक्ष होती थी। मैं ब्लॉक के विकास कार्यों में सदैव सक्रिय भाग लेता था और बाहर सीख कर वहां उपयोग में लाने का प्रयास करता था। उस समय ब्लाॅक प्रमुख, क्षेत्रीय विकास का इंजन होता था। आज बहुत बदल गया है।

उत्तराखण्डियत का पहला गैस्ट लैक्चर मैंने वाई.एस. परमार जी से लिया। मैं ब्लॉक प्रमुख था, देश के आम चुनाव में डॉ परमार प्रचारक के रूप में हमारे यहां आये। भिकियासैण में उनकी आमसभा थी, रास्ते में डाक्टर साहब ने दुकानों व मोडों में गाड़ी रोककर मुझसे बीजू आलू, मडुवा-झोगंरा के खेत, मिर्च को लेकर कई सवाल किये। आमसभा में मेरे बाद डाक्टर साहब आधा घंटा बोले, आधे घंटे में 24 मिनट, मडुवा-झोंगरा, सब्जी, फलों व पहाड़ों की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर अपनी सोच बताई और 5 मिनट उन्होंने राजनीति पर बात की और कहा कि उत्तर प्रदेश में क्यों हेमवती जी की सरकार चाहिये? उन्होंने कहा उत्तर प्रदेश बड़ा राज्य है और इंदिरा गांधी जी से कहा पहाड़ी व्यक्ति मुख्यमंत्री होगा तो यहां वो पहाड़ों की वकालत करेगा। अंत में उन्होंने दो शब्द मेरी तारिफ करते हुये कहा कि इन्हें मैं एक हफ्ते के लिये अपने घर बुला रहा हॅू। परमार से हिल एग्रोनोमी व पहाड़ीयत पर सीखा हुआ मेरे बहुत काम आया। मेरी उत्तराखण्डियत सोच का विश्लेषण डॉ. वाई.एस. परमार ने किया। उन्होंने मुझे दूसरा मंत्र दिया, यदि कुछ करने व निर्णय लेने का अवसर मिले तो पहाड़ की महिला के कष्ट को नीतिगत निर्णय का केन्द्र बिन्दु बनाया।

राजनीति में संयोग का बड़ा महत्व होता है। समय व मेरी मां की तपस्या ने मुझे इन्दिरा जी का आशीर्वाद प्राप्त करवाया। मैं अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र से 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का उम्मीदवार घोषित हो गया। स्व. संजय गांधी जी का सानिध्य व लखनऊ विश्व विद्यालय के दोस्तों का इसमें बहुत बड़ा योगदान रहा। संयोग देखिये मुझे देश के दो महान उदभट्ट विद्धानों से चुनाव लड़ना पड़ा। डॉ. मुरली मनोहर जोशी जी व डॉ डी.डी. पंत जी, डॉ पंत उक्रांद के अध्यक्ष भी थे। बाद के वर्षों में जसवंत सिंह बिष्ट जी, काशी सिंह ऐरी जी, विपिन त्रिपाठी जी सहित उक्रांद के नेताओं को अपना अस्तित्व बनाने के लिये यहां तक की ब्लॉक प्रमुख बनने के लिये भी मुझसे राजनैतिक लड़ाई लड़नी पड़ती थी। स्व. जसवंत सिंह जी एक कर्मयोगी थे, मगर उनकी एकाध सौ वोटों से विजय ‘‘कफल्टाकाण्ड’’ का दुष्परिणाम थी, उसमें उक्रांद का कुछ भी योगदान नहीं था, ‘‘कफल्टाकाण्ड’’ एक अत्यधिक दुःखद व शर्मनाक लोभहर्षक हत्याकाण्ड था। इस घटना के सर्वणों व शिल्पकारों को आमने-सामने खड़ा कर दिया। इस घटना से सारी पाली-पछावों में विस्फोटक तनाव पैदा हो गया। दबे हुये पक्ष की रक्षा का दायित्व क्षेत्रीय सांसद के नाते मेरे ऊपर था। मैं, केन्द्रीय गृहमंत्री जी को पैदल बिरल गांव लेकर गया और मैंने साफ-2 कहा कि अब एक भी छोटी सी घटना होगी तो क्षेत्र में सेंट्रल सिक्योरिटी फोर्सेस लगा दी जायेंगी। लोगों में मेरे प्रति बहुत गुस्सा था। मैं अपना कर्तव्य निभा रहा था, अन्यथा क्षेत्र में बड़ा खून-खराबा हो जाता। जब मैं, सल्ट की तरफ चुनाव प्रचार के लिये जा रहा था, लोगों ने बंदूक दिखाकर भी मेरा रास्ता रोकने का प्रयास किया, उत्तेजनापूर्ण नारे लगाये। शशीखाल (सल्ट) में मेरी गाड़ी पर बड़ा पथराव हुआ, कुछ पत्थर मुझे लगे, मैं माईक लेकर गाड़ी के बोनट पर खड़े होकर बोलने लगा। लोग धीरे-2 शांत हो गये, पथराव करने वाले कई लोग बाद में मेरे अच्छे साथी बने और सामाजिक तौर पर क्षेत्र के महत्वपूर्ण व्यक्ति बने। कांग्रेस इस घटना से चुनाव हार गई। विधानसभा में उक्रांद को प्रतिनिधित्व मिला। मुझ पर पृथक राज्य विरोधी होने का ठप्पा और गहरा हो गया। उठक-पटक के मध्य राजनीति आगे बढ़ती गई। सन् 1991 मैं रामलहर में लगभग 25 हजार वोटों से चुनाव हार गया और पार्टी ने संसद में मेरी सक्रियता को पुरूस्कृत करते हुये मुझे राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस सेवादल के संचालन की जिम्मेदारी सौंप दी।

इसी दौरान उत्तर प्रदेश में शिक्षण संस्थाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के मुलायम सिंह जी के आदेश के विरोध में पहाड़ों में, सार्वजनिक विरोध व आन्दोलन प्रारम्भ हो गया। पौड़ी में आन्दोलन थोड़ा बड़ा था, पार्टी की ओर से मैं सभी आन्दोलन स्थलों पर गया। कांग्रेस ने लाठीचार्ज की निंदा करते हुये पहाड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण की परिधि से बाहर रखने की मांग की। पार्टी की यह मांग मुलायम सिंह जी को सौंपी गई। इस दौरान घटनाक्रम तीव्रता से मुलायम समर्थक बदला। कौन हैं और उनके विरोध में कौन लोग हैं इसी को देख रहे थे। कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर कोई स्पष्ट निर्णय नहीं ले पायी, क्योंकि मीडिया ने उत्तराखण्ड में चल रहे जन आन्दोलन को आरक्षण विरोधी का ठप्पा लगाकर प्रचारित कर दिया। सामाजिक न्याय के लिये प्रतिबद्ध कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के लिये एका-एक कोई निर्णय लेना सम्भव नहीं था। मैंने दिल्ली में बात कर कुछ प्लेटफॉर्म बनाया, जहां बैठकर निर्णय किया जा सके। उत्तराखण्ड में एक के बाद दूसरे, तीसरे, चौथे गोलीकाण्डों ने सब ध्वस्त कर दिया। मैं बहुत प्रयत्न कर राज्य कर्मचारी जो हड़ताल पर थे, जिनके ऊपर ब्रेक इन सर्विस का खतरा पैदा हो गया था, उन्हें पुनः कार्य पर लौटने व ब्रेक इन सर्विस आदि उत्पीड़क कार्यवाहियों में बचाने का फैसला करवा पाया। माननीय इन्द्रमणी बड़ोनी जी ने दो बार मुझसे कहा, भैय्या हम तो हमेशा लड़ते रहे, कुछ भी करवाओ।

मैंने स्व. इन्द्रमणी बड़ोनी जी की तत्कालिक आंतरिक सुरक्षा मंत्री राजेश पायलट से दो बार वार्ता करवाई और आन्दोलन का समाधान निकालने का प्रयास किया। मैंने एक ड्राफ्ट बनाया। जिसमें हिल कॉन्सिल के विधाई अधिकारों का भी जिक्र था। इस दौरान यू.के.डी. के लोग मेरी अनुपस्थिति में पायलट जी से उनके घर मिले, उन्हें डर था कहीं मुझे तो कॉन्सिल का चेयरमैन नहीं बनाया जा रहा है। जबकि दूर-दूर तक इसकी कोई सम्भावना नहीं थी, बड़ोनी जी के साथ बैठक में यह तय हुआ कि हम पहले प्रस्ताव की घोषणा पायलट से करवायें, उसके बाद यू.के.डी. इस पर अन्य लोगों की सहमत करवायेगी। हमने उनसे सुझाव को मानते हुये तालकटोरा स्टेडियम में एक खुली बैठक बुलाई। गढ़वाल सभा के अध्यक्ष कान्ता प्रसाद बलोदी जी इस काम में लगे। खचा-खच भरे तालकटोरा स्टेडियम में मेरे सहित राजेश पायलट, जितेन्द्र प्रसाद दिल्ली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपचन्द्र बन्धु सहित कुछ विधायक, पूर्व विधायक भी सभा में थे। मेरे व दीपचन्द्र जी व जितेन्द्र प्रसाद जी के बोलने तक शांति रही, जैसे ही मैंने हिल कॉन्सिल के प्रस्ताव के प्रारूप की घोषणा का राजेश पायलट जी से अनुरोध किया, 3-4 कोनों से संगठित तौर पर विरोध प्रारम्भ हो गया, विरोध करने वालों में उत्तराखण्डी पत्रकार भी थे। राजेश पायलट जी यह कहकर कि जब आपकी राय बन जाय, मुझे बुला लेना, मैं आ जाऊंगा, सभास्थल से चले गये।

बाद में राजेश पायलट जी ने वार्ता में सम्मलित होने से इंकार कर दिया। वार्ता को पुनः प्रारम्भ करवाने के लिये मुझे शंकर राव चहवाण, गृहमंत्री जी से एक डैलिगेशन मिलवाना पड़ा। उनके निर्देश प श्री कामरान व पी.एम. सईद ने आन्दोलनकारियों से वार्ता की। आन्दोलन का रूख देखकर बड़ोनी व उक्रांद, कभी आगे तो कभी पीछे हटता रहा। हां, हिल कॉन्सिल का ढोल मेरे गले अवश्य पड़ गया। चाहते न चाहते भी मुझे बजाना पड़ा।  क्रमशः (हरीश रावत)

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