भारत के एजुकेशन सिस्टम को बदलते ज़माने के अनुकूल होने की सख्त जरूरत

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भारत के एजुकेशन सिस्टम को बदलते ज़माने के अनुकूल होने की सख्त जरूरत

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बेशक हम समय के पहियों के साथ आगे तो बढ़े हैं, लेकिन हम अभी-भी कुछ पुरानी आदतों को अपनी जगह से हिला नहीं पाए हैं।


प्रगतिशील देशों को एक साथ काम करने के लिए प्रगतिशील दिमाग की जरूरत है। इसके लिए देशों को मानव मन की क्षमताओं को उजागर करने की आवश्यकता है, और इन्हें उजागर करने का शिक्षा या एजुकेशन से बेहतर माध्यम मेरे ज़हन में नहीं आता। भारत में एजुकेशन सिस्टम वैदिक काल से चला आ रहा है, जब गुरुकुल या पाठशालाएँ, गुरुजनों की उपस्थिति में प्राकृतिक वातावरण में हुआ करती थीं। घर-परिवार और दुनियादारी से दूर बच्चे गुरुजनों के मार्गदर्शन में इन राष्ट्रीय स्तर के गुरुकुलों में लम्बा समय बिताकर तमाम विद्या अर्जित किया करते थे। देश में सबके लिए समान शिक्षा समय के पन्नों में कहीं दबकर रह गई है। यह बात और है कि समय के साथ इसमें कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं।

आज के समय के कॉम्पिटिशन को देखते हुए सरकारी अधिकारियों ने एजुकेशन के महत्व और इसके माध्यम से लोगों के जीवन में काफी हद तक सुधार की पुष्टि की है, इस प्रकार सभी के लिए शिक्षा को एक लक्ष्य घोषित किया है। हालाँकि, हम इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारत सरकार और संस्थान, मौजूदा शिक्षा मॉडल में सुधार के लिए लगातार काम कर रहे हैं, फिर भी कई मुद्दे ऐसे हैं, जिनसे हम अभी-भी जूझ रहे हैं।

जैसा कि समान शिक्षा की बात मैंने ऊपर कही, यहाँ मेरा अर्थ देश के विभिन्न बोर्ड्स से है। वर्तमान में विभिन्न एजुकेशन बोर्ड्स के पाठ्यक्रमों में विविधता भी सिस्टम में एक बड़ी समस्या बन खड़ी हुई है। भारतीय एजुकेशन सिस्टम में, स्कूल्स विभिन्न बोर्ड्स से एफिलिएट होते हैं, जो स्टूडेंट्स की संभावनाओं में फेरबदल करते हैं। असमान पाठ्यक्रम और विषय, स्टूडेंट्स के सामने कई बार विराम बनकर खड़े हो जाते हैं, खासकर जब वे राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं, जैसे- कैट, जेईई मेन्स, पीएमटी आदि में भाग लेते हैं। शिक्षकों और अधिकारियों को तत्काल जरुरत है कि वे पाठ्यक्रम के लिए एक सामान्य रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क स्थापित करें, जिसका पालन प्रत्येक एजुकेशन बोर्ड द्वारा किया जाना चाहिए, ताकि स्टूडेंट्स को समान अवसर और लर्निंग एक्सपीरियंसेस प्राप्त करने में मदद मिल सके।

बेशक हम समय के पहियों के साथ आगे तो बढ़े हैं, लेकिन हम अभी-भी कुछ पुरानी आदतों को अपनी जगह से हिला नहीं पाए हैं। रटकर सीखना उनमें से एक है। इसका सबब यह है कि स्टूडेंट उस पाठ विशेष को याद तो रख लेता है, लेकिन उसके पीछे के आधार से कोसों दूर हो जाता है। इसलिए, स्कूल्स और कॉलेजेस द्वारा वैचारिक शिक्षा या कॉन्सेप्चुअल लर्निंग को बढ़ावा देने की सख्त जरुरत है, ताकि स्टूडेंट्स संबंधित कॉन्सेप्ट्स को ठीक प्रकार समझ सकें और व्यावहारिक दुनिया में उनका बेहतरी से उपयोग कर सकें। वहीं, इन्हें लर्निंग एक्सपीरियंस के दायरे को सीमित करने से स्टूडेंट्स की वृद्धि पर भी बुरा प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए, स्टूडेंट्स को बचपन से ही विभिन्न विषयों और वोकेशनल ट्रेनिंग से परिचित कराया जाना चाहिए। इससे उन्हें अपनी क्षमता की पहचान करने और उन्हें बेहतर तरीके से विकसित करने में मदद मिलेगी।

साथ ही एडवाइज़री बोर्ड्स को प्राइवेट कम्पनीज़ और इंस्टिट्यूशंस की भागीदारी पर विचार करना चाहिए। स्कूली शिक्षा की पहुँच बढ़ाने और लर्निंग आउटकम्स में सुधार करने में सहायता के लिए प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी बेहद मायने रखती है। यह आगे चलकर इस क्षेत्र की आर्थिक स्थिति सुधारने और पर्याप्त क्षमता की कमी वाले सरकारी इंस्टिट्यूट्स का बेहतरीन पूरक बन सकती है। भारत में एजुकेशन की भारी माँग है और इसकी आपूर्ति करने के लिए प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा देना समय की माँग है।

अब समय आ गया है कि हम एक देश के रूप में, एजुकेशन को उस उच्च स्तर पर ले जाना शुरू करें, जिसके दम पर कल के युवा विश्व में बढ़ते कॉम्पिटिशन का हिस्सा बन सकें और भारत को भी इस दौड़ में शामिल कर विजयी बना सकें।
- अतुल मलिकराम (राजनीतिक विश्लेषक)