नीम करौली बाबा का पहला मंदिर, जहाँ बेअसर है गुरुत्वाकर्षण और ठीक होते हैं बच्चों के असाध्य रोग!
इस मंदिर की स्थापना, इसके पीछे की चमत्कारी कथाओं और बच्चों के असाध्य रोगों से मुक्ति के रहस्यों को लेकर नीम करौली बाबा के अनन्य भक्त और प्रसिद्ध ज्योतिषी अंकित अग्निहोत्री जी ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं।
नैनीताल (Uttarakhand Post): हमारे देश में आस्था और अध्यात्म के कई ऐसे केंद्र हैं जो विज्ञान की समझ से कोसों दूर हैं। ऐसा ही एक जागृत स्थल है उत्तराखंड के नैनीताल में स्थित हनुमानगढ़ (बजरंगगढ़)। यह वह पावन भूमि है, जहाँ विश्वविख्यात संत बाबा नीम करौली ने उत्तराखंड आने के बाद अपने सबसे पहले मंदिर की स्थापना की थी। कभी एक डरावना श्मशान घाट रहा यह टीला आज देश-दुनिया के श्रद्धालुओं के लिए असीम आस्था और दिव्य चमत्कारों का केंद्र बन चुका है।
इस मंदिर की स्थापना, इसके पीछे की चमत्कारी कथाओं और बच्चों के असाध्य रोगों से मुक्ति के रहस्यों को लेकर नीम करौली बाबा के अनन्य भक्त और प्रसिद्ध ज्योतिषी अंकित अग्निहोत्री जी ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं।
श्मशान घाट से सिद्ध पीठ बनने का सफर
साल 1950-51 के दशक में यह जगह मंदिर नहीं, बल्कि एक बेहद डरावना बजरी का टीला हुआ करती थी। इसके पास मनेरा नाम का श्मशान घाट था। उस दौर में चेचक (शीतला) जैसी महामारी के कारण असमय मृत्यु का शिकार होने वाले बच्चों को इसी टीले पर दफनाया जाता था। रात के समय यहाँ हड्डियों के ढेर दिखना और रहस्यमयी आग सुलगना आम था, जिसके डर से लोग शाम 6 बजे के बाद यहाँ आने की हिम्मत भी नहीं करते थे।
बाबा नीम करौली ने इस डरावने टीले की ऊर्जा को बदलने का संकल्प लिया। उन्होंने सबसे पहले नीचे सड़क पर बैठकर लोगों के दिलों में हनुमान जी की स्थापना की। धीरे-धीरे लोगों का डर खत्म हुआ और बाबा के निर्देश पर इस स्थान पर अखंड रामायण, सुंदरकांड और हनुमान चालीसा का पाठ शुरू हुआ, जिसने इस पूरे क्षेत्र को राम नाम की ऊर्जा से सराबोर कर दिया।
गुरुत्वाकर्षण (Gravity) को चुनौती देता भव्य ढांचा
भू-वैज्ञानिकों और स्थानीय लोगों का मानना था कि बजरी के इस खिसकते टीले पर एक ईंट की दीवार भी खड़ी नहीं रह सकती। लेकिन आज यहाँ एक विशाल और भव्य मंदिर सीना ताने खड़ा है। यह मंदिर पहाड़ियों पर गुरुत्वाकर्षण के नियमों के विपरीत (Against Gravity) बना हुआ है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि साल 1950-52 में इस मंदिर के बनने के बाद से इस पूरे क्षेत्र में होने वाला भूस्खलन (Landslides) और मिट्टी का खिसकना हमेशा के लिए बंद हो गया।
स्थापना की रात साक्षात नंदी का आगमन
हनुमानगढ़ मंदिर से जुड़ी कई प्रमाणिक लोककथाएं हैं। कहा जाता है कि जिस रात मंदिर में हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित की गई, ठीक रात 12 बजे दो विचित्र बैल (एक सफेद और एक काला) अचानक वहाँ पहुंचे। उन्होंने सामान्य बैलों से अलग हटकर हनुमान जी की प्रतिमा के आगे पूरी श्रद्धा से अपना सिर झुकाया, बड़े इत्मीनान से हलवे-पूरी का प्रसाद खाया और चले गए। अगले दिन जब बाबा नीम करौली को यह बात बताई गई, तो उन्होंने खुलासा किया कि वे कोई साधारण सांड नहीं, बल्कि साक्षात नंदी स्वरूप थे जो हनुमान जी के दर्शन करने आए थे।
हनुमान जी के दिव्य मुखमंडल का रहस्य
आरंभ में कारीगर सीमेंट से हनुमान जी की जो प्रतिमा बना रहे थे, उसमें सब कुछ तो सही बन रहा था, लेकिन लगातार कोशिशों के बावजूद हनुमान जी के मुख का वह दिव्य भाव (आकृति) नहीं आ पा रहा था। अंत में एक छोटी बच्ची को स्वप्न आया कि मूर्ति स्थापना से पहले यहाँ अखंड रामायण का पाठ कराया जाए। अखंड रामायण पाठ के संपन्न होते ही कारीगरों ने हनुमान जी का वह साक्षात जाग्रत मुखमंडल तैयार कर दिया, जिसे आज हम देखते हैं। इस विग्रह में हनुमान जी अपना सीना चीरकर हृदय में विराजमान माता सीता और प्रभु श्रीराम के दर्शन करा रहे हैं।
असमय काल के गाल में समाए बच्चों को मिली मुक्ति
मंदिर स्थापना के करीब एक वर्ष बाद, बाबा नीम करौली ने शाम 5 बजे अचानक आदेश दिया कि 2,000 से 3,000 लोगों का भंडारा तैयार किया जाए। उस निर्जन पहाड़ी पर रात के समय कौन आएगा, यह सोचकर लोग हैरान थे। लेकिन शाम 6 बजे अचानक हजारों बच्चों (14-15 वर्ष की आयु के) और कुछ बुजुर्गों की टोली वहाँ पहुँची, भरपेट प्रसाद ग्रहण किया और चली गई। इसके बाद उन बच्चों को कभी दोबारा नहीं देखा गया। बाबा ने बाद में बताया कि ये वे अतृप्त और असंतृप्त आत्माएं थीं जो असमय मृत्यु (विशेषकर चेचक जैसी बीमारियों) का शिकार होकर यहाँ दफनाई गई थीं, जिन्हें हनुमान जी का प्रसाद पाकर परम मोक्ष की प्राप्ति हुई।
ऑटिज्म (Autism) और बच्चों की जन्मजात बीमारियों के लिए वरदान
अंकित अग्निहोत्री जी के अनुसार, इस मंदिर में आज भी वह दिव्य ऊर्जा प्रवाहित होती है जो बच्चों के पुराने कर्म-बंधनों को काटने में सक्षम है। जो माता-पिता अपने बच्चों की जन्मजात और असाध्य बीमारियों जैसे—ऑटिज्म (Autism), डाउन सिंड्रोम (Down Syndrome) या हृदय संबंधी गंभीर बीमारियों से परेशान हैं, उन्हें सच्चे मन से अपने बच्चे को यहाँ लाकर हनुमान जी के दर्शन कराने चाहिए।
पीड़ित परिवारों के लिए अंकित अग्निहोत्री का महा-संकल्प: अंकित जी ने इस पावन धाम पर खड़े होकर संकल्प लिया है कि जो परिवार आर्थिक तंगी के कारण अपने बीमार बच्चों को लेकर उत्तराखंड के इस मंदिर में नहीं आ सकते, उनकी दिल्ली (या अन्य स्थानों) से यहाँ आने-जाने, रहने और भोजन की पूरी व्यवस्था उनकी टीम निशुल्क करेगी।
कष्ट निवारण का अचूक उपाय (Remedy)
यदि आप संतान के कष्टों से जूझ रहे हैं, तो मंदिर के भीतर बने शांत हनुमान कक्ष में बैठकर हनुमान जी के सामने रामायण के 'बालकांड' का स्मरण या पाठ करें। मान्यता है कि जहाँ भी बालकांड का पाठ होता है, वहाँ हनुमान जी और बाबा नीम करौली सूक्ष्म रूप में स्वयं विराजमान होकर प्रार्थना सुनते हैं और हर बड़े से बड़े संकट को टाल देते हैं।
यदि आप इस चमत्कारी और ऐतिहासिक मंदिर के दर्शन करना चाहते हैं, तो नैनीताल आने पर कैंची धाम के साथ-साथ इस पहले हनुमान मंदिर (हनुमानगढ़) में शीश नवाना न भूलें।
(नोट- उत्तराखंड पोस्ट किसी तरह के दावे की सत्यता की पुष्टि नहीं करता है। इस जानकारी को ज्योतिषि अंकित अग्निहोत्री ने अपनी रिसर्च के आधार पर Podcast में साझा किया है)
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