मसूरी शरदोत्सव की दूसरी शाम रही पहाड़ी सुरों के नाम, लोक कलाकारों ने बांधा ऐसा समां कि झूम उठे दर्शक
मसूरी(उत्तराखंड पोस्ट) पहाड़ों की रानी मसूरी इन दिनों लोकसंगीत और संस्कृति के रंग में सराबोर है। करीब 12 साल के लंबे इंतजार के बाद शुरू हुए मसूरी शरदोत्सव 2026 की दूसरी शाम उत्तराखंड के लोक कलाकारों ने अपने नाम कर ली। टाउन हॉल में आयोजित स्टार नाइट में जैसे ही पहाड़ी गीतों की आवाज गूंजी, पूरा माहौल लोकधुनों से गुलजार हो गया।
कार्यक्रम में गजेंद्र राणा, संगीता ढौंडियाल, मनोज सागर, मंजू नौटियाल, मन्नू वंदना और वीरेंद्र पंवार समेत कई कलाकारों ने प्रस्तुतियां दीं। लोकप्रिय पहाड़ी गीतों पर स्थानीय लोगों के साथ पर्यटक भी देर रात तक झूमते नजर आए।
12 साल बाद लौटा मंच, कलाकारों में दिखा उत्साह
मसूरी शरदोत्सव का दोबारा आयोजन उत्तराखंड के कलाकारों के लिए खास मौका लेकर आया है। लंबे अंतराल के बाद मिले इस मंच को लेकर लोक कलाकारों में खासा उत्साह दिखाई दिया। इस बार आयोजन में स्थानीय प्रतिभाओं को प्राथमिकता दी गई है। नगर पालिका की ओर से शरदोत्सव के करीब 80 फीसदी कार्यक्रम उत्तराखंड के कलाकारों को समर्पित किए गए हैं। इससे प्रदेश के स्थापित कलाकारों के साथ नए और उभरते कलाकारों को भी बड़ी संख्या में दर्शकों के सामने अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिल रहा है।
पहाड़ी संगीत ने बदला अपना अंदाज, लेकिन नहीं खोई पहचान
कार्यक्रम में पहुंचे कलाकारों ने बताया कि समय के साथ उत्तराखंड के संगीत में काफी बदलाव आया है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पहाड़ी गीतों को नई पहचान दी है। अब पहाड़ के कलाकारों और उनके गीतों की पहुंच सिर्फ स्थानीय दर्शकों तक नहीं रही, बल्कि देश के दूसरे राज्यों और विदेशों में रहने वाले उत्तराखंडियों तक भी हो रही है। पहाड़ी गीतों में आधुनिक संगीत, नए वाद्ययंत्र और बेहतर तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा है। वीडियो प्रोडक्शन और पिक्चराइजेशन में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। इसके बावजूद लोकधुन, पहाड़ी भाषा और यहां की जीवनशैली आज भी इस संगीत की सबसे बड़ी पहचान बनी हुई है।
लोकसंस्कृति को नई पीढ़ी से जोड़ने की कोशिश
शरदोत्सव के जरिए सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश भी की जा रही है। कलाकारों का मानना है कि ऐसे आयोजनों से युवाओं को अपनी जड़ों और लोकपरंपराओं से जुड़ने का अवसर मिलता है। उनका कहना है कि अगर प्रदेश के पर्यटन स्थलों और अलग-अलग शहरों में नियमित रूप से ऐसे मंच मिलते रहें तो उत्तराखंड के लोकसंगीत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत पहचान मिल सकती है।
मीरा सकलानी बोलीं- संस्कृति को मंच देना है मकसद
नगर पालिका अध्यक्ष मीरा सकलानी ने कहा कि लंबे अंतराल के बाद शरदोत्सव को दोबारा शुरू करने के पीछे मसूरी की सांस्कृतिक पहचान को फिर से मजबूत करना प्रमुख उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि आयोजन में उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को विशेष जगह दी गई है। उनके मुताबिक, स्थानीय कलाकारों के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों की सांस्कृतिक टीमों को भी बुलाया गया है। इससे मसूरी आने वाले पर्यटकों और स्थानीय लोगों को देश की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को करीब से देखने का अवसर मिल रहा है।
खेलों को भी बनाया गया शरदोत्सव का हिस्सा
इस बार शरदोत्सव का दायरा सिर्फ सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रखा गया है। युवाओं और बच्चों को जोड़ने के लिए अलग-अलग खेल प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जा रही हैं। नगर पालिका के अनुसार, शरदोत्सव के जरिए कला, संस्कृति और खेल के क्षेत्र में स्थानीय प्रतिभाओं को आगे लाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रतियोगिताओं में बच्चों से लेकर अनुभवी खिलाड़ियों तक की भागीदारी देखने को मिल रही है।
दर्शकों ने जमकर उठाया पहाड़ी संगीत का लुत्फ
स्टार नाइट के दौरान टाउन हॉल में बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचे। कलाकारों की प्रस्तुतियों के साथ माहौल लगातार रंगीन होता गया। पहाड़ी गीतों की धुन पर दर्शक खुद को थिरकने से रोक नहीं पाए। करीब 12 साल बाद आयोजित हो रहा मसूरी शरदोत्सव एक बार फिर शहर की सांस्कृतिक पहचान को सामने ला रहा है। दूसरी शाम में जहां पारंपरिक लोकसंगीत की झलक देखने को मिली, वहीं आधुनिक दौर के संगीत का प्रभाव भी नजर आया।
कलाकारों ने भी शरदोत्सव के दोबारा आयोजन को उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और कलाकारों के लिए सकारात्मक कदम बताया। उनका कहना है कि ऐसे मंच कलाकारों को पहचान देने के साथ-साथ पहाड़ की संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
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